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खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली

तुमरी तौ खुट्यों मा जब लगला पराज
अर आँखि यखुली मा रगरे जाली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।लगालु बथौ, ऐकी गीत चौक तिबरी मा
अर बुग्यालों की पिड़ा खुट्यों कुतग्यलि लगाली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।गाड-गदेरा जब धै लगै की भट्याणा राला
अर हैरी डाली बोटी तुम थै सनकाणी राली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।डोखरी-पुंगड़ियों मा जब लागलु घाम तैलु
या दूर डाँडियुं कुई घस्येरी खुदेणी राली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।होलु कुई जब डाला छैल अधुरवै कैकि
या कै बुलाणा खु चुल्लो की आग भभराली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।बडुलि बणी की जु खुद लगलि गौला मा
या सुपिन्यों मा सनकाली कुई आँखि रत्नयालि
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।बस्ग्याल सी बरखलि कबि जु आँखि दगड्यों
या जिकुड़ि, सौंजङ्यां कुई धीर धराली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।सारी जब हैरी पिंगली रंगो मा रंगी होली
अर समलौंण कैकि कुई घार बिटि आली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।भितर कखि कुई जब कुई दानु खासलु
अर खबरसार जब कैमा घार-गौ की सुण्यालि
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।बरखा कु लग्यु रालु झमणाट
अर डाँडियूं जब कुयेड़ि घनघोर लागली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।
@नोप सिंह नेगी(खुदेड़)
971 6959 339
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नमस्कार दोस्तों खुदेड़ डाँडी काँठी से आप अब ऑनलाइन किताबे खरीद सकते है, साथ ही यदि आप लिखने के शौक़ीन है और अपनी किताब प्रकाशित करना चाहते है तो, आप हमसे संपर्क कर सकते है। हम रावत डिजिटल के साथ मिलकर नई किताबे प्रकाशित कर रहे है, यदि अभी आपके पास अपनी किताबे है और उन्हें आप बेचना चाहते है तो आप उन्हें भी KDK के माध्यम से बेच सकते है आप KDK पर अपना स्वयं का स्टोर बना सकते है।
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karwachuath करवाचौथ

करवाचौथ पर विशेष कविता कविवर श्री नंदन राणा जी द्वारा अवश्य देखे और अपने साथियों और विवाहित जोड़े अपने जीवनसाथियो को अवश्य सुनाये



अनोप सिंह नेगी खुदेड़
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Veer Madho Singh Bhandari वीर माधो सिंह भंडारी

आप सभी साथियों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं।
आज शिक्षक दिवस पर एक शिक्ष द्वारा तैयार किये कुछ बालको द्वारा किया गया यह अभिनय वीर माधो सिंह भंडारी पर आधारित है। इसका मंचन 15 अगस्त 2018 को राइजिंग सन पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा किया गया जिन्हें तैयार किया स्कूल में कार्यरत शिक्षक संजय चौधरी जी ने। वीर माधो सिंह भंडारी जिन्होंने अपने गांव के लिए पानी लाने के लिए अपने पुत्र गजे सिंह की बलि दे दी थी। पुत्र बलि के इस बलिदान को नाटक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
जरूर देखिए आपको कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा और चैनल को सब्सक्राइब करके घंटी वाले बटन को जरूर दबाए ताकि चैनल पर आने वाली सभी वीडियो का नोटिफिकेशन आप तक पहुँच सके।   



अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339



Sab Khandwar Sab Lampsar सब खंद्वार सब लम्पसार

सब खंद्वार सब लम्पसार





अंद्वार जो छा यख
सब बणिगीं उंदै का
मायादार ।
सर्या गौं मा
कूडि पचास
आदिम चार ।
ढक्यां छी
घर घरु मा
छैंदा मवसि
का द्वार ।
म्यार मुल्क की
ई च अब
तिसलि अंद्वार ।
सग्वडि पत्वडि
बांझि प्वडि छीं
मनखि बताणा
अफ्थै हुश्यार ।
घुर्तम घुर्त्यो
कैरिकी खूब
चिताणा छी
चलक्वार ।
सिकासैरियूंमा
बिराणा छी
स्यो त्यार
यो म्यार ।
द्यख्ये जावा त
सुद्दि कुछ ना
सब खंद्वार
सब लम्पसार ।।


वीरेन्द्र जुयाळ "उप्रि" उर्फ अजनबी

World Environment Day Song of Uttarakhand

Kya ye wahi pahar hai? Part-4 क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4

क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4 -------------------------------------------------------------------------

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आज उस पहाड़ की बात करूंगा जो हमारा इंतज़ार करते करते हताश हो चुका है। जहा से हम रोज़गार के लिए, शिक्षा के लिए  पहाड़ो से आये थे, लेकिन हम उस गांव को उस पहाड़ को इस तरह भुला देंगे ये तो शायद तब सोचा भी नही होगा। लेकिन सच्चाई यही है हम अपना गांव छोड़ चुके है। आज के इस भाग में मैं बात कर रहा हूं "डुटियाल जी प्रधान"  एक लघु फ़िल्म जिसे देखने वाले तो शायद सिर्फ अपने खाली वक़्त में इसे समय दे रहे होंगे देखने के लिए, लेकिन इसे लिखने वाले लेखक ने इसमे काम करने वाले किरदारों ने पहाड़ से लगातार हो रहे पलायन से रूबरू करवाने का प्रयास किया है। हम पहाड़ी परदेशियों को आइना दिखाया है। आज पहाड़ की यादों को नही हक़ीक़त को लिखने का प्रयास कर रहा हू आशा है आपको पसंद आएगा।
इस 22 मिनट की छोटी सी फ़िल्म का सारांश लिखने से पहले इसके सभी कलाकारों निर्माता निर्देशक का धन्यवाद करना चाहूंगा। और उनके नाम यहां दे रहा हूं।
यह 22 मिनट 2 सेकेंड की …

Kya ye wahi pahar hai? Part - 3 क्या ये वही पहाड़ है? भाग - ३

क्या ये वही पहाड़ है?  भाग - 3 ---------------------------------------- बधाण/ बालण पुजै:- गाय या भैंस के बछड़ा/बछिया के जन्म जन्म के बाद 11वें या 21वें दिन की जाने वाली पूजा। बधाण पूजा आपने भी कई बार देखी होगी हो सकता है प्रान्त अनुसार अलग हो लेकिन होती सभी जगह है। यह पूजा का साथ भी हर परिवार का अलग और निश्चित होता है। अक्सर दादा हमे अपने साथ लेकर जाया करते थे।  जंगलो से घास लाना घर की बहू और बेटियों का ही कार्य था, लेकिन ऐसा नही कि मर्द न जाते हो मर्द भी जाया करते थे। जंगलो में घास काटते हुए महिलाये गीत गाते हुए वादियों को गुंजाया करती थी। घास लेने जाने से पहले अक्सर सभी महिलाएं किसी एक स्थान पर इंतज़ार करती और इस स्थान को पलिन्थरा कहा जाता था। इस स्थान पर सभी अपनी दराती को धार लगाया करती ये पत्थर पर घिसने से खूब धारदार कर दिया करती थी अपनी अपनी दराती को।  बरसातों के समय जंगलो में च्यूं(मशरूम के भिन्न भिन्न प्रकार) स्वतः ही निकल जाए करते थे, इन्हें लेने सुबह सुबह छाता लेकर हम चल दिया करते। ऐसे मौसम में जौक(एक प्रकार का कीड़ा जो शरीर के जिस हिस्से से चिकत है खून के साथ ही छोड़ता है और तंब…