Skip to main content

Posts

Showing posts from 2015

शराब हज़ारो की

ये कविता उन भाइयो को लिए जो शराब पी बर्बाद हो रहे है। काश उन्हें भी ये कविता पढ़ने का समय मिल पाता!!!!!!!!!!!!!!!!!!!पी जाते हो शराब हज़ारो की
बस थोड़ा सा ख्याल रखना उन लाचारों की
बोतल तोड़ फेंक न देना रहो में
चुभ जाते है टुकड़े किसी के पांव मेंटूटी बोतल देख भी कोई मायूस होता है
क्योंकि आठ आने की बोतल में भी उसका परिवार पलता है
जिन बोतलों को खाली कर तुम घर बर्बाद करते हो
कोई उन बोतलों के सहारे घर अपना आबाद कर रहा होता है जिस बोतल के लिए मंगलसूत्र पत्नी का तुमने बेच दिया
उसी बोतल को उठा किसी ने जीवन का शुरुआत किया
जिस बोतल के लिए तुमने परिवार अपना छोड़ दिया
उसी बोतल से किसी ने अपना परिवार जोड़ लियानशा तो दोनों को है इस बोतल का
बस फ़र्क़ इतना ही है
एक नशे में राह पकड़ रहा है
और एक राह से भटक रहा हैअनोप सिंह नेगी(खुदेड़)

चकबन्दी कु सैलाब

चला दगड़यों गांव मा मकान जो सूना छी ऊ थै अब घर हम बणौला खौंदार हुई वू कुड़्यो थै फिर से सजौला घर कु आँगन थै नौना बालो की किलक्वारी से गुंजौला चकबन्दी कु सैलाब अयु चा चला दगड़यों हम भी तौरी जौला। छोड़ी की ये मोल की हवा पाणी थै घर बौड़ी शुद्ध हवा पाणी कु आनन्द उठौला अंजान यु शहरो थै छोड़ी की गाँव गल्यो मा फिर से मेल जोल बढ़ोला चकबन्दी कु सैलाब अयु चा चला दगड़यों हम भी तौरी जौला। हैल दंदला का लाठो थै फिर से बणौला हरच्या वू निसुड़ो थै फिर से खुज्यौला आ हे पहाड़ का वंशज पहाड़ी चल एक बार फिर से वे पहाड़ थै बचौला चकबन्दी कु सैलाब अयु चा चला दगड़यों हम भी तौरी जौला। अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)


तुझसे पहले

कहानी मेरी कुछ अज़ीब होगी
तुझसे शुरू है तुझपर ही ख़त्म होगी
चाहता हूँ मैं तुझे किस कदर
कैसे बताऊ तुझे ऐ मेरे हमसफ़र।गई गर तू मुझे छोड़कर तो देख लेना
तुझसे पहले रुख़स्तगी मेरी होगी
वहा भी राहो में फूल बिछाये मिलुंगा
तुझसे पहले वहा मौजूदगी मेरी होगी।तेरे बिन जीना पड़े मुझे ऐसा मैं होने न दुंगा
ख़ुद से पहले तुझे मैं जाने न दुंगा
तू सोच रही होगी जाने की
तुझसे पहले मैं ये दुनिया छोड़ दुंगा।राह जिस तू जायेगी खड़ा मैं मिलुंगा
तेरे क़दम रखने से पहले उस जगह को गुलशन कर दुंगा
तू दो कदम ही चली होगी
और मैं सफ़र ख़त्म कर चूका हूँगा।तू पहुचेगी जब वहां
आशियाना हमारा बन चूका होगा
तू पूछती है ये क्या पागलपन है
ये चाहत ही तो है मेरी जो मैं इतना कुछ कर गुजरूँगा।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339




शहर में

अक़्सर गाँव छोड़ चले आते है लोग शहर में
ग़ुम हो जाते है चकाचौंध इस शहर में
कहते है रोज़गार नही कोई गाँव में
जिस ओर देखो बेरोज़गारी के बाज़ार लगे है शहर में
कहते है शिक्षा का आभाव है गाँव में
शिक्षा यहाँ भी खास नही दिखावा है बस शहर में गाँव के अमृत को भी ठुकरा देते है
ज़हर भी पी लेते है शहर में
छोड़ आये है गाँव पलभर में
लेकिन बस नही पाये अभी तक शहर में
अक़्सर गाँव छोड़ चले आते है लोग शहर में
ग़ुम हो जाते है चकाचौंध इस शहर में गाँव का पानी जिन्हें गन्दा लगता नहर में
नाले का पानी पी रहे छान छानकर शहर में
जब तक समझ आती है ज़हम में
मज़बूर हो चुके होते है शहर में
अक़्सर गाँव छोड़ चले आते है लोग शहर में
ग़ुम हो जाते है चकाचौंध इस शहर में अब पछतावा होता है क्यों निकले थे गाँव से
फसकर रह गए अज़नबी इस शहर में
स्वस्थ थे गाँव की पानी हवा में
आज बीमार से रहते है इस शहर में
अक़्सर गाँव छोड़ चले आते है लोग शहर में
ग़ुम हो जाते है चकाचौंध इस शहर में अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

Rajula Malushahi-2

दोस्तों आपने राजुला मलशाही की जो कथा पढ़ी आशा है आप लोगो को पसन्द आयी होगी।
काफ़ी समय से मुझे इसके अगले भाग के लिए कई बार मेसेज आये लेकिन समयाभाव के कारण लिखने में असमर्थ था आज फिर से वक़्त मिला तो फिर से लिखना शुरू किया है दोस्तों आइये तो चलते है इस सत्य प्रेम कथा के अगले भाग में और जानिए फिर क्या होता है, जब राजुला पहुच जाती है बिंदिया स्यर में अब राजुला बिंदिया स्यर में पहुच जाती है किसी तरह और वहा जब राजुला पर कहैड़ कोट के राजा कउआ के सेवक भगुवा की नज़र पड़ती है तो राजुला के सौंदर्य को देख वो चक्कर खा गिर पड़ता है। और फिर वो सोचता है की काश ये मेरे मालिक की रानी हो जाती और तत्पश्चात वो कउआ के पास जाता है अब कउआ के बारे में।
            दिखने में कैसा था छह बेटो का बाप 9 नाती पोते और हालात कुछ ऐसे जैसे जिसकी आँखों की पलके भी नाक तक झूल रही थी काख ऐसे जैसे किसी चिड़िया का घोसला हो।
           अब कउआ बिंदिया स्यार में जाता है लेकिन उसकी नज़र राजुला को देख ही नही पाती तब भगुआ उसकी पलकों को अपने हाथो से हटाता है तब कहि जाकर उसकी नज़र राजुला पर पड़ती है। अब कउआ भगुआ से कहता ह…

कख गेनि

न गंज्यलो की घम-घम च
न जन्दरो कु घरड़ाट च
चुल्लो मा भी आग नीच अब
छन्यो मा भी कीला ज्यूड़ा नि रैनी अब
पींडा कु तौलू भी सोचणु रैंदु
कख गौड़ी भैस्यू कु जब्लाट च
जै घासा का पैथर गाली खैएनी
अब वे घास कटण्या हाथ ही से गेनि
कख घासा की खुम(पलकुण्डि) होली
कख पिरुला की गडोली होली
सुबेर रतब्याण्या चली जांदी छै बेटी ब्वारी धाणा खु
नया जमना दगड़ी वो भी कन बदली गे होली
थमली दथुड़ी भी काकर ही रै गेनि
कुटला भी झणि अब कै पुंगडा हरचेनि
मौनू(मधुमक्खी) का जलठा भी अब नि रैनी
कागा बसदा छाई धुरपलि मा
वूल भी अब आणु जाणु छोड़ियेलि
जगरियु की डौर थकुलि भी अब नि बज्दिनी
मिजाण देबता भी अब मॉर्डन व्हैगेनिअनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

मी अर मेरा पहाड़

मी तरसू वे पहाड़ खु, पहाड़ तरसू मीखु
मीमा वक़्त नि वेमा जाणा कु, वो हिली नि सकदु मीमा आणा खु
मी जांदू जब भी वेमा मी रुंदु छौ
वो हैसांदु च तब भी दुःख अपणा लुकैकि
आज ये पहाड़ की वा हालत करी च
पीड़ा त हुन्दी च वे थै पर कैमा बोली नि सकणु च
राजनीती का जाल मा मेरु पहाड़ हरचणु च
आण वला वक़्त मा हालत यी देखि मन यु बौलेणु च
क्या होलु ये पहाड़ कु सोची सोची
"खुदेड़" यु खौलेणु च अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

शादी की सालगिराह

हे प्रिये आज आठ वर्ष पूरे हुए हमारी शादी के
राही जीवन के आज हम एक हुए
ऐ मेरे हमसफ़र मैं तुमपर तुम मुझपर
प्रेम अपना यू ही बनाये रखे
अटूट विश्वास हम दोनों को इक दूज़े पर
इसे हम यूँ ही कायम रखे आओ हम आशीष ले सभी से
की जोड़ी हमारी बनी रहे
जीवन में न हो कोई ग़म
यूँ ही बीत जाये ये जीवन
हे प्रिये आज आठ वर्ष पूरे हुए हमारी शादी के
राही जीवन के आज हम एक हुए अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

व्यवस्था त जनि की तनि रैगी

उत्तराखण्ड की व्यवस्था त जनि की तनि रैगी
लेकिन मनखी भी अब तनि व्हैगी
बात करा उत्तराखण्ड का भविष्य की
पर छ्वि दानो की भी बालो जन रैगी
हम छ्वि लगाणा उत्तराखण्ड कु विकास कनकै होलु
अर वो क्रिकेट की बॉल खुज्यान्दी रैगी हम पहाड़ी क्षेत्रो थै जिला बणाणै की बात करदा
शहरी क्षेत्रो का पहाड़ी हमरी बातु थै कख लगैगी
हम पहाड़ो थै हैरु भैरू बणाणै कोशिश करदा
स्यू डाला काटी घर अपणा मॉडर्न बणाण बैगी
उत्तराखण्ड की व्यवस्था त जनि की तनि रैगी
लेकिन मनखी भी अब तनि व्हैगी हम पहाड़ो मा रोज़गार का वास्ता प्रयासरत
वू बच्यां रोजगारों थै भी लुछी की चलिगी
पहाड़ों कु पहाड़ी त प्यासु च
सी पाणी भी पहाड़ो कु शहरो मा बेचण लैगी
उत्तराखण्ड की व्यवस्था त जनि की तनि रैगी
लेकिन मनखी भी अब तनि व्हैगी हम पहाड़ो थै अड्यासु दे सम्भलण लग्या छा
अर वू ऐकी सबुलु लगै पहाड़ थै खौंदार कैगी
घर गाँव हमल अपणा हरचैनि
उज्यालु सी परदेशी लीगी
उत्तराखण्ड की व्यवस्था त जनि की तनि रैगी
लेकिन मनखी भी अब तनि व्हैगी सर्वाधिकार सुरक्षित
@अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339
facebook.com/khudeddandikanthi
twitter.com/khudeddandikant
khudeddandikanthi.in
k…

पहाड़ थै शहर बणौला

आवा दगड़यों पहाड़ो थै शहर बणौला
शहरी संस्कृति लेकिन पहाड़ो मा आण नि दयोला
हमारू युवा पलायन न करो कुछ इन करुला
पहाड़ी एक मिशाल बणी जौ काम इन करुला
आवा दगड़यों पहाड़ो थै शहर बणौला
शहरी संस्कृति लेकिन पहाड़ो मा आण नि दयोला राति की बासी रोटी सुबेर चायी दगड़ी खौला
रुमुक पॉड्या परिवार दगड़ी छुई बात लगौला
एक बार फिर से बग्वाली का रात मा भैला चलौला
खौला मेलो मा गीत झुमैलो बाजु बन्द लगौला
आवा दगड़यों पहाड़ो थै शहर बणौला
शहरी संस्कृति लेकिन पहाड़ो मा आण नि दयोला एक बार फिर से डाँडीयों मा बखरा चरौला
बांजा पुंगड़ो खैण्डि की फिर से चलदा करुला
चला मेरा दगड़यों पहाड़ बौड़ी जौला
डाली बोटी लगै की पहाड़ थै हैरु भैरू करुला
आवा दगड़यों पहाड़ो थै शहर बणौला
शहरी संस्कृति लेकिन पहाड़ो मा आण नि दयोला अनोप सिंह नेगी(खुडेड़)
9716959339
facebook.com/khudeddandikanthi
twitter.com/khudeddandikant
youtube.com/खुदेड़डाँडीकाँठी

विकास तेरी आस मा

हिलिगे मेरु पहाड़, हे विकास तेरी आस मा
खौंदार व्हेगेनि पहाड़ हमरा, हे विकास तेरी आस मा
विनाश ही विनाश दिखेणु पहाड़ कु, हे विकास तेरी आस मा
पर तू दिखेंदु नि छै, दूर तक कैकि आस मा घास लखडु सब हरचिगेनि, हे विकास तेरी आस मा
बाँज-बुरांश भी नि दिखेंदु अब, हे विकास तेरी आस मा
डाली बोटी सब कटेगेनि, हे विकास तेरी आस मा
पर तू दिखेंदु नि छै, दूर तक कैकि आस मा छोया-पंदेरा सब बिश्कि गेनी, हे विकास तेरी आस मा
रौला-गदना भी मुख मोड़ी गेनी, हे विकास तेरी आस मा
डोखरी-पुंगड़ी सब बर्बाद व्हेगेनि, हे विकास तेरी आस मा
पर तू दिखेंदु नि छै, दूर तक कैकि आस मा हमरा पुरणो(पूर्वजो) का सुपिन्या सुपिन्या ही रैगेनि, हे विकास तेरी आस मा
पहाड़ कु युवा आज भी भटकुणु च, हे विकास तेरी आस मा
पहाड़ी पहाड़ छोड़ी चलिगे, हे विकास तेरी आस मा
पहाड़ कु पहाड़ी खुदेणु च, हे विकास तेरी आस मा
पर तू दिखेंदु नि छै, दूर तक कैकि आस मा अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
facebook.com/khudeddandikanthi
twitter.com/khudeddandikant
youtube.com/खुदेड़डाँडीकाँठी
9716959339

वक़्त

वक़्त भी बड़ा अज़ीब होता है,
इसका मिलना कहाँ सबके नसीब होता है।
जिसे क़द्र नही वक़्त की,
उसके पास वक़्त ही वक़्त होता है।
वक़्त का एहसास जिसे होता है,
उम्रभर वक़्त के लिए वो रोता है।वक़्त कैसा भी हो अच्छा या बुरा,
समझौता इससे कर लेना ही अच्छा होता है।
वक़्त बदले या न बदले ऐ "खुदेड़" हमें बदलना ही होता है।
वक़्त भी बड़ा अज़ीब होता है,
इसका मिलना कहाँ सबके नसीब होता है।
वक़्त के आगे इंसान भी कितना मजबूर होता है,
क्योंकि वक़्त के संग न चलना ही उसका कसूर होता है।
उम्र कट जाती है वक़्त के इंतज़ार में,
वक़्त लेकिन आकर निकल भी जाता है।
वक़्त भी बड़ा अज़ीब होता है,
इसका मिलना कहाँ सबके नसीब होता है।
अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339
फेसबुक
ट्विटर
यूट्यूब

आरक्षण

आरक्षण आरक्षण इस चार एक छोटे से शब्द ने देश में आज भी भेद-भाव का माहौल बनाया हुआ है, इस स्थिति पर कुछ लाइन पेश कर रहा हु आशा करता हु इस कविता को गलत दिशा की ओर नही मोड़ा जायेगा और सभी को पसंद आएगी। मैं इस कविता को किसी भी धर्म या जाति को केन्द्रित करके नहीं लिख रहा हु बस आरक्षण की निति बदलनी चाहिए इस विषय पर लिख रहा हु।



आज देश का हर नेता कहता है मैंने ये कर दिखाया वो कर दिखाया कोई इनसे पूछे क्या कोई आज तक आरक्षण ख़त्म कर पाया कहते है मैं बिजली लाया मैं पानी लाया कोई इनसे पूछे क्या गरीबो के लिए भी कोई आरक्षण है बनाया आरक्षण का ये राक्षस पूरे भारतवर्ष में है छाया है क्या ऐसा भी कोई नेता जो हटा सके देश से इस राक्षस का साया हटाये तो तब कोई जब ख़त्म होगी इनकी मोह-माया वर्ना हमें तो लगता है देश के हर नागरिक का वोट जायेगा जाया दोस्तों ये आरक्षण एक बहुत बड़ा अभिशाप है भारतभूमि पड़ चुकी इसकी गहरी छाप है कहते है सब एक सामान है लेकिन फिर भी आरक्षण की निति से एक-एक नागरिक का कर रहे अपमान है दिल किसी का मैं दुखाना नही चाहता निति-राजनीति में पड़ना नही चाहता लेकिन क्या करू मजबूर हु मैं भी जब संसद में बैठा कोई खुद को ब…

पहाड़

मैं लिखता नही कलम चल जाती है
शब्द बनाता नही अक्षर जुड़ जाते है
कोशिश करता हूँ बहुत कुछ लिखने की
ख़याल मुझे मेरे पहाड़ो की ओर ले जाते है
राह कोई भी क्यों न देखु लेकिन
रास्ते पहाड़ो में ही निकल आते है
चाह तो दिल में बहुत है लेकिन
चाहत पहाड़ो पर ख़त्म हो जाती है
सपने तो बहुत तो बहुत है आँखों में लेकिन
नींद पहाड़ो में पहुचकर खुल जाती है
प्यास तो बहुत है इस कण्ठ में
बुझती पहाड़ो से निकलती धाराओ से है अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
Facebook
Twitter
Youtube

आस

खुदेड़ डाँडी काँठी या
खुदेणी आज अपणो की आस मा
कख होला मेरा अपणा
कुई नि दिखेणु च पास मा
                  बांजी पुंगड़ी खौंदार कूड़ी
                   देखदा रुंदा यु पहाड़ो थै
कीला ज्यूड़ा रमदा यख गोर-बछरो की गौल्यो थै
हैल-दंदलु भी खोजदा बल्दो की कंद्यो थै
दथुड़ा-कुटला हेरदा मनख़्यो का हाथो थै
जंदुरु भी तरसदु ग्युह कोदा की दाण्यो थै डाल्यों कु छैलु भी लग्यु रैंदु बटोयु की सास मा
छोया-पंदेरा भी बिस्कणा पंदेन्यु की आस मा डाँडी काँठी भी हरचिगेनि
घस्येन्यू की याद मा
खुदेड़ डाँडी काँठी या
खुदेणी आज अपणो की आस मा अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
+91-971 695 9339
Facebook
Twitter
Youtube

15 अगस्त 2015

आज के इस दिन की खुशिया तो मना रहे हो जरूर मनाओ लेकिन एक बार उन लोगो को जरूर याद कर लेना जिन्होंने इस दिन को बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।आज मेरे हिंदुस्तान में जाने कितने धर्म हो गए
क्या बीतती होगी उन आत्माओ पर जो हमारे ली सबकुछ खो गए।एक बार भी न सोचा जिन्होंने अपने बारे में
हमारे लिए वो सदा के लिए सो गए।भूखे प्यासे लड़ते रहे थे जो देश के खातिर
फिर भी अपना सारा लहू वो बहा गए।आज भी आत्मा उनकी अमर है
देश को जो आज़ाद करा गए।एक बार उनको याद जरूर करना मेरे देश वासियो
आज़ादी हमें जो दिला गए।आज हम उनको याद जरूर करेंगे मेरे दोस्तों
आज के बदलते माहौल में जिन्हें हम भूल गए।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339
facebook
Twitter
Youtube

क्या काम की

वा संस्कृति क्या काम की
जो इंसान की काम नि आई सको संस्कृति बचाण से क्या फ़ायदा जब
इंसान मी बचै नि सकदु एक भाई रूणु च अर
मी हैसणा की बात करदु इनी हैंसी कु क्या फ़ायदा
जु कैकि रोयी नि बुथ्याई सको इन जवानी कु क्या फ़ायदा
बुज़ुर्ग कु बोझ उठै न सकोइन आँखों कु क्या फ़ायदा
जु बाटू कै थै दिखै न सको इन जुबान कु क्या फ़ायदा
जु कभी कैका वास्ता बोली नि सकोइनी नींद कु क्या फ़ायदा
जु सुपन्या कै थै दिखै न सको वू कंधो कु क्या फ़ायदा
सहारा कैका जो बणी नि सको इनी मोरणा कु क्या फ़ायदा
जीवन भर जु कैका काम नि आ सको इनी संस्कृति थै बचाण से क्या फ़ायदा
इंसान थै जो बचै नि सको अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339फेसबुकट्विटर







कलम मेरी

आज वे पहाड़ की गाथा लिख कलम मेरी
वू ढुंगो पर लगी चोट लिख कलम मेरी आज पहाड़ की वेदना लिख कलम मेरी
यु बांजा पुंगड़ो की आस लिख कलम मेरी सूखा गदनो की प्यासी धरती की प्यास लिख कलम मेरी
दानी आँख्यु की आस लिख कलम मेरी कैकि खुद मा बीती सारी रात लिख कलम मेरी
आंदारा जांदरो मा मेरु रैबार लिख कलम मेरी बग्वाली का भैलो की आग लिख कलम मेरी
रुआँसी माँ की हर एक साँस लिख कलम मेरी हैल लगांद आंदी छौ ज्वा खैरी आज लिख कलम मेरी
ब्यो बारात मा स्याल्यु की गाली आज लिख कलम मेरी
पहाड़ की याद मा इनी मिठास लिख कलम मेरी
एक बार जु चाखि ल्यो फिन कभी न भूलो कुछ खास लिख कलम मेरीबोल्दु का गालो मा खांकर कु गणमणाट लिख कलम मेरी
पंदेरो मा पंदेन्यु की छुयु कु गुमणाट लिख कलम मेरीयाद ऐ जा मेरा खुदेड़ भाइयो थै खुदेड़ डाँडी काँठी की
कुछ इन बात लिख कलम मेरीअनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
Facebook
Twitter
Youtube
Instagram

मेरा सुख दुःख

मेरी कविता मेरी ज़ुबानी नौ मेरु अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
जन्म दिल्ली प्रदेश मा लीनी (21 जुलाई 1984)
पहली बार देवभूमि उत्तरखण्ड का दर्शन सन् 86 मा व्हेनि।
बचपन बीती मेरु गाँव बजरखोड़ा।
पट्टी - बिचला चौकोट, तत्कालीन ब्लॉक - स्याल्दे, पत्रालय- कुलांटेश्वर, जिल्ला - अल्मोड़ा।
यू गाँव-गल्यो मा मेरु बचपन खेलि की बडु होइ
यखी डाँडी काँठयु गोर चरै मिल
आज भी मन कब्लान्दु च याद करी वो दिन।
तीन पास करी की दुबारा उंदु ऐग्यो
बड़ा लाड प्यार से माँ-पिताजी, दादा दादी नि बडु करयु।
सपना त उंका छाया मीथै बहुत कुछ बणाणा का
पर मी उंका सपनो कु मोल नि दे सकु अर तीन साल नौ मा ही रैग्यो।
तिसरा साल नौ पास करी दस भी पास व्हेगी
नौकरी का तलाश मा मी लगी।
छोटी भुली से उम्मीद छै वा कुछ करली
पर आश तोड़ी वा हमसे कुछ जादा ही दूर चलिगि।
खानदान मा कुई छाई ज्वा सबसे पैली बारह म ग्यायि
पर विधाता थै कुछ और ही मंज़ूर छाई।
पर जैदिन वा ग्यायि झणि किलै मीथै निंद भी नि आई
अब सबसे छोटी भुली भी बड़ी व्है ग्यायि
वील त कम से कम माँ-पिताजी की इज़्ज़त रखी द्याई।
अब एक बार फिर जमना की ठोकर खैकि मिल पढ़ै शुरू काई
द्वी हज़ार छै मा मिल बारह पास…

लिखूंगा कुछ ऐसे

लिखुंगा कुछ ऐसे की दर्पण नया
लेकिन परछाई पुरानी होगी।
बदले चाहे ज़माने लेकिन
मेरी कविताओं में बस पहाड़ो की कहानी होगी।
जो बदल गए है, जो नही बदले है
कोशिश उन्हें बदलने की होगी।
पेड़ सूखकर भले ही दरख़्त हो जाय
लेकिन फिर भी पतियाँ हरी होगी।
सूरज भले ही डूब जाय
लेकिन फिर भी चाँद में चाँदनी उसीकी होगी।
खेत-खलिहानों में देख लेना
हर ओर मेहनत किसानो की होगी।
नदियों की छलारो को गौर करना
जरूरत उसे सूखी पड़ी जमीन की होगी।चीर कर देख लेना शरीर के किसी भी हिस्से को
मोहोब्बत बस पहाड़ो से होगी।
जब कभी बात होगी यादो की तो
"खुदेड़" को कगद हमेशा "खुदेड़ डाँडी काँठी" की होगी।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
facebook.com/khudeddandikanthi
twitter.com/khudeddandikant
youtube.com/c/खुदेड़डाँडीकाँठी
9716959339

बेबसी

बेबसी इंसान की वा हालात कैर दीन्द
न त भूख लगदी न नींद।कख जी जौ, क्या जी करू, कनकै होलु
रटण बस इखरी रैंद।जैका मुख मा नज़र जांद आश वेमा ही हूंद
क्या पता वेमा ही कुई उपाय मिली जौ मन ई बुलन्द।राति का अँधेरा सीण नि दींदा
दिन का उज्याला चैन नि लीण दींदा।सिराणा बैठी की बेबसी इन चुंग्न्यान्द
सीणु त मुश्किल दगड़यों बैठ्युं भी नि राई जांद।बार-बार ऐकी इन झुरांद
गाती मा जन कुमुरु सी बिनांद।बात एक-एक सच्ची च
किलै की "खुदेड़" की अज़माई च।

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)

बुराँश

हे बुराँश आज तेरी भी कुई इज़्ज़त नि रै
राज्य पुष्प व्हेकि भी तू बज़ारो मा बिकणु छै।
जब तक तेरी कुई पूछ नि छै खुटो मुड़ मंदेणु रै
आज पछ्याण तेरी बणिगि त लोगु का घरो मा सज्यू छै।
आज गिलासु मा सज्यू छै
जू ब्याली तक डाँडीयु मा खत्यु छै।
ते थै भी मिजाण आदत व्है ग्यायि गिलास बोतलु की
तभी तू अब डाँडी काँठीयूँ नि दिखेणु छै।
        पर हे बुराँश तेरी खुद मा आज भी
               यु "खुदेड़" खुदेणु च रे!
अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)facebook.com/khudeddandikanthi

याद वा पुराणी

याद वा पुराणि
हैंसी त आंदी पर वो ख़ुशी नि मिल्दी,
जो ख़ुशी तब मिल्दी छै जो हैंसी हम थै माँ-पिताजी हैसांदा छाया। हिटदु छौ मी लमडुदू भी छौ पर,
अंगुली पकड़ी चलण सीखै जौ हाथुन आज भी वू हाथु थै थामी की जिकुड़ी हल्की व्है जांद।चीज़ त आज भी खांदा छा पर,
माँजी बाटी की दिन्दी छै वू स्वाद अब नि आन्द।
त्यौहार त अब भी घर मा मनेंदा पर,
खांदा मा की खाणा की रस्याण अब नि आंद।पाणी भी पींदा छा पर,
छोया पन्देरु का पाणी की तीस आज भी नि जांद।याद त भौत आंद पर यादो मा,
"याद पुराणी" आज भी नि जांद।जिकुड़ी आज भी खुदेड़ डाँडी काँठी की,
याद मा  खुदेणी रांद।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)

भद्रेश्वर महादेव Bhadreshwar Mahadev

भद्रेश्वर महादेव नमस्कार दोस्तों आज आपको ले चलते है, नंदा देवी पर्वत की ओर जहा बसते है भद्रेश्वर महादेव तो चलिए चलते है आज एक नई दिशा की ओर।
      उत्तराखण्ड (Uttarakhand) में इस सिद्धपीठ भद्रेश्वर शिवलिंग केजलाभिषेक से पुत्र दाई प्रत्यक्ष प्रमाण सदियों से प्रचलित है।       इस स्थान के पूर्व में आसमान को छूते नंदादेवी पर्वत, जिसे पार्वती जी का स्वरुप भी कहा जाता है, दिखाई देता है। कहा जाता है कि बड़ागाँव ग्राम में किसी व्यक्ति के पास कपिला गाय थी, कपिला गाय ने जब पहली बार एक बछड़े को जन्म दिया और ११(ग्यारह) दिनों तक प्रयाप्त दूध देकर अपने मालिक को प्रसन्न करती रही। परन्तु बारहवें दिन से गाय ने सायंकाल से दूध देना बंद कर दिया।  मालिक को शक हुआ कि कोई अन्य व्यक्ति गाय का दूध दूह लेता है, मालिक गाय पर नज़र रखने लगा और हमेशा की तरह गाय चराने वन ले गया अचानक उसकी नज़र गाय पर पड़ी उसने देखा गाय भद्रेश्वर महादेव के लिंग पर खड़ी होकर भगवान आशुतोष का अभिषेक कर रही है। जैसे ही वह शिवलिंग तोड़ने को तैयार हुआ तभी एक आवाज़ आई “अपनी गाय को खूंटे से बाँधो” तभी से गायों को खूंटे से बाँधने का प्रचलन शुरू हुआ।�…