Facebook

पहाड़

मैं लिखता नही कलम चल जाती है
शब्द बनाता नही अक्षर जुड़ जाते है
कोशिश करता हूँ बहुत कुछ लिखने की
ख़याल मुझे मेरे पहाड़ो की ओर ले जाते है
राह कोई भी क्यों न देखु लेकिन
रास्ते पहाड़ो में ही निकल आते है
चाह तो दिल में बहुत है लेकिन
चाहत पहाड़ो पर ख़त्म हो जाती है
सपने तो बहुत तो बहुत है आँखों में लेकिन
नींद पहाड़ो में पहुचकर खुल जाती है
प्यास तो बहुत है इस कण्ठ में
बुझती पहाड़ो से निकलती धाराओ से है

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
Facebook
Twitter
Youtube

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां