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Melia Azedarach bakain डैकण

डैकण, बैकन, बकायन

यह एक ऐसा फल है जो अक्सर आपने जंगलों, में खेतों के किनारे घरों के नजदीक जरूर देखा होगा। आज हम बात करेंगे उस पहाड़ी वनस्पति के बारे में जिसका उपयोग न सिर्फ़ आयुर्वेद में होता है बल्कि इसका उपयोग यूनानी चिकित्सा में भी होता है और साथ ही यह एक ऐसी वनस्पति है जिसका उपयोग आप कीटनाशक के रूप में भी कर सकते हैल और जानकर लोग करते भी है। अनाज भंडारण में भी इसकी पत्तियों का प्रयोग किया जाता है। उत्तराखण्ड में इसे डैकण या बकैन के नाम से जाना जाता है, भारत मे इसका प्रचलित नाम बकायन है, विज्ञान की भाषा मे इसे Melia Azedarach के नाम से जाना जाता है।
बकैन का प्रयोग बहुत सी बीमारियों के उपचार हेतु किया जाता है, इसकी पत्तियां गाय भैंस आदि जानवरो को दिया जाता है। नीम से इसकी तुलना की जाए तो नीम की ही तरह यह भी बहुत ही गुणकारी वृक्ष है। नीम से बहुत से कीटनाशक बने है किंतु बकैन का उपयोग अभी तक किसी भी कीटनाशक को बनाने में नही हुआ है। इससे यदि कीटनाशक तैयार किया जाए तो काफी फायदे मिल सकते है। डैकण ही एक ऐसी वनस्पति है जिसकी तुलना विश्वभर में नीम से की जाती है इन दोनों के गुण लगभग समान है। आज यदि 10 डॉलर का नीम की दातुन बिक सकती है तो डैकण की क्यो नही बस जरूरत है हमे इसके गुणों को समझने की।
आज जगह जगह खेती होती है और उसमें रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, किन्तु यदि रासायनिक गुणों से भरपूर बकैन का उपयोग कर हम इसका कीटनाशक तैयार करे तो न तो इससे फसल को नुकसान होगा और न ही हमारे स्वास्थ्य को नुकसान होगा। यदि इसका प्रयोग हम खेती में कीटनाशक के रूप में करे तो इसके हमे फायदे ही मिलेंगे नुकसान कुछ भी नही होगा। बकैन के फल में तेल अच्छी मात्रा में उपलब्ध होता है जो कि औषधीय व कीटनाशक गुणों से भरपूर होता है। इस तेल में Lenoleic acid, Myristic acid, Palmitic acid, Oleic acid, Stearic acid जैसे रासायनिक अव्यव पाए जाते है। सके अलावा इसके फल में मुखयतः Azedirachtin, व Tetanoterpenoids पाए जाते है। बकैन के हर भाग को प्रयोग में लाया जा सकता है, इसके फल, तेल, छाल व पत्तियों को कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है और इसके खल से खाद तैयार की जा सकती है जो कि भूमि की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाएगी।
अब बात करते है इसके औषधीय उपयोग की, इसमें एन्टीऑक्सीडेंट, ऐनालजैसिक, एन्टीहाईपरटेंसीब, एन्टीडाइरल, एन्टीडाईबेटिक गुण विद्यमान होते है। इसकी छाल की यदि बात करे तो इसका प्रयोग अल्सर, बुखार, दर्द, उल्टी, पाइल्स, खांसी, गैस, शीतपित्त, जलन, पेट के कीड़ों को मारने, गले के रोगों तथा अतिसार के उपचार में उपयोग की जाती है। इसकी छाल का उपयोग मंजन के लिए जा सकता है जो दांतो को साफ व मजबूत बनाए रखता है।
नोटः-  पित्त और काफ़ को दस्तों के द्वारा बाहर करता है।
इसका तना अस्थमा रोगियों के लिए वरदान होता है, इसकी जड़ की यदि बात की जाए तो ये कड़वी होती है किंतु मलेरिया और अतिसार जैसी बीमारियों में इसे प्रयोग में लाया जाता है। कुछ ऐसे अध्ययन भी इसपर हुए है जिनसे यह सामने आया कि यदि इसके सूखे फलों की छाल का मधुमेह में उपयोग किया जाए तो इससे जल्दी ही आराम मिलता है। बताया जा रहा है कि पेट साफ करने हेतु बनी दवाई में भी इसका उपयोग किया जाता है। इसके तेल की बात करे तो यह तेल चर्म रोग में काम आता है।
खून को साफ करने में सहयोगी होता है, बवासीर के लिये यह अतत्यन्त लाभकारी है। यही खुजली में भी राहत देता है।
कुत्ते के काटने पर यदि इसकी जड़ का रस निकालकर पी लिया जाए तो जहर खत्म हो जाता है। गठिया/जोड़ो का दर्द में 10 ग्राम बकैन की जड़ की छाल को सुबह शाम पानी मे पीसकर, छानकर लगातार एक माह तक पीने से कितना भी पुराना गठिया रोग हो समाप्त हो जाता है। इसके बीजों को सरसों तेल के साथ पीसकर गठिया वाली जगहों पर लगाने से भी गढ़िया रोग से मुक्ति मिलती है। पित्त की वजह से आंखों में होने वाले दर्द में बकैन के फलों को पीसकर इसके गोले बनाकर आंखों पर बांधने से आराम मिलता है। कम दिखने और मोतियाबिंद में भी बकैन उपयोगी है।
इसके लिए एक किलो बकैन के पत्ते धोकर पीसकर, तथा निचोड़कर रस पत्थर में खूब अच्छी तरह घोंटकर, सूखाकर, घोटते वक्त इसमें भीमसेनी कपूर 3 ग्राम मिलकर काजल की तरह एक पेस्ट तैयार कर ले और फिर रोज सुबह शाम काजल की तरह प्रयोग करे मोतियाबिंद के साथ साथ आंखों की अन्य बीमारियों में भी आराम मिलता है। मुह के छालों में भी बकैन उपयोगी होता है, 10 ग्राम बैकन की छाल व 10 ग्राम सफेद कत्था इनका चूर्ण बनाकर इसे लगाने से मुह के छाले ठीक हो जाते है। बकैन के सूखे बीज को पीसकर चूर्ण बनाकर इसका सुबह शाम पानी के साथ सेवन करने से बवासीर में भी आराम मिलता है।
बकैन का उद्गम यू तो दक्षिण एशिया है किंतु यह मैक्सिको, अमेरिका, जापान, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका तथा यूरोप आदि देशों में भी बकैन उपलब्ध है।
भारत मे इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है जो कुछ इस प्रकार है।
गढ़वाली             डैकण
कुमाऊनी            बकैन
संस्कृत               महानिम्ब
हिंदी                  बकायन/बकाइन
गुजराती             बकामलीमड़ी
मराठी               बकाणलींब
बांग्ला               महानिम/घोड़ा नीम
कन्नड़               महाबेवु/अरबेधु
तेलगु               तुरकवेपा/पेदावेपा
तमिल              मलाइवेंबु
फ़ारसी            आजाद दरख़्त
अरबी             हर्बीत/बान
पंजाबी           धरेक
लैटिन             नेलिया अजेडेरक

बकायन का कभी भी अधिक सेवन नही करना चाहिए अधिक मात्रा में यदि इसका सेवन किया तो इसकी तासीर गर्म होने के कारण यह अमाशय और हृदय को नुकसान पहुचा सकता है। इसके फलो की तुलना मजीठ से कर सकते है।
इसका सेवन 5 से 10 ग्राम के बीच ही करना चाहिए।
दोस्तो इसके अनेक नाम जानकर आप समझ ही गए होंगे कि यह भारत मे लगभग सभी जगह उपलब्ध है। नीम हर जगह उपलब्ध नही होता किन्तु यह लगभग सभी जग मिल जाएगा।
आपको लेख पसंद आये तो इसके बारे में अपने साथियों और जानकारों के साथ अवश्य सांझा करे।
अगले लेख में फिर से एक और वनस्पति के साथ आपके बीच आऊंगा तब तक पिछले लेख पढ़ते रहे और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।

ऐसी ही और वनस्पति की जानकारी के लिए आप मेरे ब्लॉग पर बाकि अन्य पोस्ट देख सकते है।

पिछले कुछ वानस्पतिक लेख
भीमल                      बुराँश शर्बत             कंडली
कुणजु/ नागदाना        लिंगुड़ा                   हिंसर
किलमोड़ा                  घिंगरु                    भमोरा

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

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