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Timla Ficus Auriculata तिमला

तिमला Ficus auriculata

नमस्कार दोस्तो आज आपको बताना भी चाह रहा हूं और आप लोगो के सुझाव भी चाहता हूं कि यदि जो जानकारियां मैं आप लोगो तक लिखकर भेज रहा हूं ददी इनकी एक वीडियो श्रृंखला भी चलाई जाए तो क्या यह बेहतर होगा कि लोगो तक और आसानी से मैं अपनी बात पहुँचा सकू।
आप लोगो की प्रतिक्रियाए आती है आप लोगो को लेख पसंद आ रहे है इसी कारण मुझे और आगे लिखने का हौसला बढ़ता है। यदि कुछ त्रुटियां हो तो कृपया उससे भी अवगत कराएं ताकि आगे से उनपर भी ध्यान दे सकू।

आज जिस फल की चर्चा होने वाली है इसका स्वाद अधिकांश लोगों ने जरूर लिया होगा। मैं तो पेड़ में बैठकर ही खाना शुरू कर देता था अब भी कभी यदि तिमला पकने के मौसम में गांव पहुँच जाता हूं तो इस मौके को छोड़ता नही। इसे अधिकतर लोग खाते तो है किंतु सिर्फ स्वाद के लिए जबकि उन्हें नही मलूम कि इसके कितने फायदे होते है। जी हां दोस्तो अब इस फल का अचार भी पहाड़ो से काफी अच्छी मात्रा में सप्लाई हो रहा है। हम स्वयं अचार को बेच रहे है जो कि हम सप्ताह में स्टॉक मंगवाते है लेकिन 3 से 4 दिनों में ही यह अचार खत्म हो जाता है जबकि हर बार क्वांटिटी बढ़ाकर ही मंगवा रहे है। बुराँश जूस के फायदे जानने के बाद लोग बुराँश जूस भी खूब मांग रहे है। दोस्तो आप यदि कोई भी उत्तराखण्डी खाद्य पदार्थ मंगवाना चाहते है तो आपको उपलब्ध करवाई जाएगी हमारी संस्था है खुदेड़ डाँडी काँठी साहित्य कला मंच(पंजी.) इसी संस्था के द्वारा हम उत्तराखण्डी खाद्य पदार्थो को भी आप तक पहुचाने का प्रयास कर रहे है, उत्तराखण्ड के कई प्रकार के खाद्य पदार्थ अभी हम दिल्ली एनसीआर में सप्लाई कर रहे है और यदि कोई बाहर से भी कोई जुड़ना चाहे तो हमसे जुड़कर इस कार्य को आगे बढ़ाने में सहयोग कर सकते है। साथ ही यदि कोई किसान इस पोस्ट को पढ़ रहे है तो वह भी हमसे संपर्क कर सकते है आपके समान को लेकर हम सीधे ग्राहक तक पहुचायेंगे।
तो अब बात करते है आज के फल की, दोस्तो ये है तिमला हिंदी में इसे अंजीर के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे Elephant Fig के नाम से जाना जाता है, विज्ञान की दुनिया मे यही Ficus Auriculata के नाम से जाना जाता है।

भारत मे इसे अलग अलग स्थानों पर अलग अलग नाम से जाना जाता है जो कुछ इस प्रकार है :-

संस्कृत             काकोदुम्बरिका।
हिंदी                अंजीर
मराठी              अंजीर
गुजराती            पेपरी
बंगाली              पेयारा
अंग्रेजी              फिग
लैटिन               फिकस कैरिका

पहाड़ो में तिमला को अनेको नामो से जाना जाता है जैसे तिमला, तिमिल, तिरमल आदि। यदि इसके कुल की बात करे तो यह मोरेसी कुल का है, गूलर भी इसी प्रजाति से है।
एक समय था जब तिमला के पत्तो से पत्तल बनाये जाते थे तिमला या मालु को शुद्ध माना जाता है और इनके पत्ते आकार में काफी बड़े होने के कारण ही इनसे पत्तल बनाये जाते थे और धार्मिक कार्यो में भी इन्ही पत्तो का प्रयोग होता था। 
उत्तराखण्ड में तिमला समुद्रतल से 800 से 2000 मीटर की ऊँचाई पर आसानी से हो जाता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि तिमला बिना फूल वाला फल है, ऐसा कहा जाता है किंतु मैं जहा तक समझता हूं कि इसका फूल खिलता ही नही है और धीरे धीरे एक निश्चित आकार तक बढ़ने के बाद यह पक जाता है, और यही फूल इसमें फल का रूप ले लेता है। यही कारण है कि जब हम इसे खाने के लिए तोड़कर काटते या दबाते है तो इसके अंदर पंख लगे जीवित कीड़े निकलते है। ऐसा सभी मे नही होता कुछेक में ही होता है।
जैसा कि मैं अपने हर लेख में आपको बताता हूं कि मैं ऐसी वनस्पति के बारे में बात करता हूं जिसके महत्व को हम लोग नही समझते और ये स्वतः ही पैदा हो जाते है, उन्ही में से एक तिमला भी है। पहाड़ो में अधिकांशतः तिमला खेतो के किनारे पर मिल जाएगा आपको। तिमला भी अन्य पहाड़ी वनस्पतियों की ही तरह पौष्टिक और औषधीय है।
विश्वभर में इसकी काफी प्रजातीया उपलब्ध है। तिमला भारत के अलावा भूटान, नेपाल, चीन, म्यांमार, वियतनाम, इजिप्ट, ब्राजील, दक्षिणी अमेरिका, टर्की, ईरान, तथा अल्जीरिया में भी पाया जाता है। भारत मे तिमला उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश में होता है।
यदि इसके औषधीय गुणो पर प्रकाश डाला जाए तो ये इस प्रकार है:-
घाव भरने, हैजा, पीलिया, तथा अतिसार जैसे जानलेवा बीमारियों का उपचार तिमला में छुपा हुआ है। इससे बीमारियों का निवारण तो हो जाता है साथ के साथ इससे आवश्यक पोषकतत्व की पूर्ति भी हमारे शरीर को हो जाती है। इंटरनेशनल फार्मास्यूटिकल साइंस रिव्यु रिसर्च के अनुसार तिमला को सेब और आम से भी बेहतर माना गया है। यह वजन बढ़ाने ने में सहायक होने के साथ पोटेशियम की अच्छी मात्रा के कारण सोडियम के दुष्प्रभाव को कम करता है और रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। वन अनुसंधान संस्थान के केमेस्ट्री डिवीजन के शोध से पता चला है कि तिमला के तेल में फैटी एसिड होने के कारण कैंसर के अलावा और भी अन्य बीमारियों का उपचार तिमला में है। इस शोध की चर्चा जब राष्ट्रमंडल वानिकी सम्मेलन में की गई तो इसके बाद से ही देश विदेश की दवा निर्माता कंपनिया भी तिमला की तरफ आकर्षित हो रही है।
वेल्थ ऑफ इंडिया के अनुसार तिमला में प्रोटीन  5.3%, कार्बोहाइड्रेट 27.09%, फाइबर  16.96% कैल्शियम। 1.35, मैग्नीशियम। 0.90, पोटेशियम  2.11 और फॉस्फोरस  0.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम तक पाए जाते है। तिमला के पके हुए फल में फ्रुक्ट्रोज, ग्लूकोज़ तथा सुक्रोज का बेहतर स्रोत माना जाता है, जिसमे कोलेस्ट्रॉल और वसा नही पाया जाता है। तिमला में जीवाणुनाशक फिनोलिक तत्व भी पाया जाता है, और एन्टीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होने के कारण यह शरीर मे टॉक्सिक फ्री रेडिकल्स को निष्क्रिय कर देता है। अंजीर से बवासीर का इलाज़ अंग्रेजी दवाओं से भी तेजी से होता है और बेहतर रिजल्ट सामने आते है।
तिमला का उपयोग फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल में ही नही बल्कि इसका उपयोग व्यावसायिक तौर पर जैम, जैली, आचार, बेकरी उद्योगों,  में भी किया जाता है। इसकी सब्जी भी बनाई जाती है। चीन में तिमला का औषधीय उपयोग हजारों वर्षों से होता आ रहा है।
FAOSTAT 2013 के अनुसार विश्व मे तिमला का लगभग 1.1 मिलियन टन उत्पादन किया जाता है जिसमे भारत मे इतना तिमला होता है लेकिन उत्पादन नही किया जाता है। सबसे अधिक तिमला तुर्की में 0.3, इजिप्टी में 0.15, अल्जीरिया में 0.12, मोरक्को में 0.1 तथा ईरान में 0.08 मिलियन टन उत्पादन करते है।
तिमला को अधिकतर सुखाकर मेवे के रूप में ही बेचा जाता है। ताज़ा तिमला लगभग 50 से 70 रुपए प्रति किलो बिकता है जबकि सूखे मेवे के रूप में इसकी लगभग 400 से 450 प्रति किलो बिकता है इसका कारण यह भी होता है जब यह ताज़ा होता है तो इसका वजन अधिक होता है जो कि सूखने पर बहुत कम हो जाता है।
यदि इसे व्यापारिक रूप से उत्पादन किया जाए तो बेहतर परिणाम मिलेंगे। इसके लिए नमी वाली जल निकासी वाली दोमट और क्षारीय मिट्टी की भूमि बेहतर होती है। यदि इसके बाग लगाने हो तो मई महीने में गढ्ढे खोदकर उन्हें कम से कम 2 सप्ताह तक यूंही खुला छोड़ देना चाहिए, फिर इसमें खाद डाले खाद जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख में बात की थी कि डैकण एक कीटनाशक पौधा है इसलिए इसके पत्ते और इसकी खल का उपयोग कीजिये और साथ ही मैंने घिंगरु के बारे में भी बताया था कि इसके पत्ते मिट्टी की ऊर्वरक शक्ति बढ़ाने में सहायक होते है इसलिए इसके पत्तों का भी प्रयोग किया जा सकता है। इन सभी को मिलाकर गढ्ढे भर दे। प्रति एक्कड़ (8 नाली) लगभग 160 गड्ढे बनाये जाएंगे। अब पुराने पेड़ो से पिछले वर्ष निकली टहनियों से लगभग 10 इंच काट कर ले ले। और बरसात के समय रोपण कर ले।
लगभग 3 साल के बाद पेड़ फल देने शुरू कर देगा। तिमला का  हर पेड़ अपनी उम्र के दोगुने फल देता है। इसके पत्तों का प्रयोग दुधारू पशुओं के लिए बेहतर माना जाता है।
आखिर में आपको बताते चले कि रोम में इसे भविष्य की समृद्धि चिन्ह माना जाता है और वहां लोग इसका बहुत आदर करते है।
दोस्तो आगे फिर आपके बीच लेकर आऊंगा एक और वनस्पति के साथ तब तक आप और अधिक वनस्पतियो की जानकारी के लिए ब्लॉग को सब्सक्राइब कर ले ताकि आपको जानकारी जल्दी से मिल सके।
www.khudeddandikanthi.blogspot.in

अन्य वनस्पति जो इस प्रकार है

भीमल                      बुराँश शर्बत             कंडली
कुणजु/ नागदाना        लिंगुड़ा                   हिंसर
किलमोड़ा                  घिंगरु                    भमोरा                       डैकण/डकैन

अनोप सिंह नेगी (खुदेड़)
9716959339

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