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Showing posts from 2018

karwachuath करवाचौथ

करवाचौथ पर विशेष कविता कविवर श्री नंदन राणा जी द्वारा अवश्य देखे और अपने साथियों और विवाहित जोड़े अपने जीवनसाथियो को अवश्य सुनाये



अनोप सिंह नेगी खुदेड़
9716959339

Veer Madho Singh Bhandari वीर माधो सिंह भंडारी

आप सभी साथियों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं।
आज शिक्षक दिवस पर एक शिक्ष द्वारा तैयार किये कुछ बालको द्वारा किया गया यह अभिनय वीर माधो सिंह भंडारी पर आधारित है। इसका मंचन 15 अगस्त 2018 को राइजिंग सन पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा किया गया जिन्हें तैयार किया स्कूल में कार्यरत शिक्षक संजय चौधरी जी ने। वीर माधो सिंह भंडारी जिन्होंने अपने गांव के लिए पानी लाने के लिए अपने पुत्र गजे सिंह की बलि दे दी थी। पुत्र बलि के इस बलिदान को नाटक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
जरूर देखिए आपको कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजियेगा और चैनल को सब्सक्राइब करके घंटी वाले बटन को जरूर दबाए ताकि चैनल पर आने वाली सभी वीडियो का नोटिफिकेशन आप तक पहुँच सके।   



अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339



Sab Khandwar Sab Lampsar सब खंद्वार सब लम्पसार

सब खंद्वार सब लम्पसार





अंद्वार जो छा यख
सब बणिगीं उंदै का
मायादार ।
सर्या गौं मा
कूडि पचास
आदिम चार ।
ढक्यां छी
घर घरु मा
छैंदा मवसि
का द्वार ।
म्यार मुल्क की
ई च अब
तिसलि अंद्वार ।
सग्वडि पत्वडि
बांझि प्वडि छीं
मनखि बताणा
अफ्थै हुश्यार ।
घुर्तम घुर्त्यो
कैरिकी खूब
चिताणा छी
चलक्वार ।
सिकासैरियूंमा
बिराणा छी
स्यो त्यार
यो म्यार ।
द्यख्ये जावा त
सुद्दि कुछ ना
सब खंद्वार
सब लम्पसार ।।


वीरेन्द्र जुयाळ "उप्रि" उर्फ अजनबी

World Environment Day Song of Uttarakhand

Kya ye wahi pahar hai? Part-4 क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4

क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4 -------------------------------------------------------------------------

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आज उस पहाड़ की बात करूंगा जो हमारा इंतज़ार करते करते हताश हो चुका है। जहा से हम रोज़गार के लिए, शिक्षा के लिए  पहाड़ो से आये थे, लेकिन हम उस गांव को उस पहाड़ को इस तरह भुला देंगे ये तो शायद तब सोचा भी नही होगा। लेकिन सच्चाई यही है हम अपना गांव छोड़ चुके है। आज के इस भाग में मैं बात कर रहा हूं "डुटियाल जी प्रधान"  एक लघु फ़िल्म जिसे देखने वाले तो शायद सिर्फ अपने खाली वक़्त में इसे समय दे रहे होंगे देखने के लिए, लेकिन इसे लिखने वाले लेखक ने इसमे काम करने वाले किरदारों ने पहाड़ से लगातार हो रहे पलायन से रूबरू करवाने का प्रयास किया है। हम पहाड़ी परदेशियों को आइना दिखाया है। आज पहाड़ की यादों को नही हक़ीक़त को लिखने का प्रयास कर रहा हू आशा है आपको पसंद आएगा।
इस 22 मिनट की छोटी सी फ़िल्म का सारांश लिखने से पहले इसके सभी कलाकारों निर्माता निर्देशक का धन्यवाद करना चाहूंगा। और उनके नाम यहां दे रहा हूं।
यह 22 मिनट 2 सेकेंड की …

Kya ye wahi pahar hai? Part - 3 क्या ये वही पहाड़ है? भाग - ३

क्या ये वही पहाड़ है?  भाग - 3 ---------------------------------------- बधाण/ बालण पुजै:- गाय या भैंस के बछड़ा/बछिया के जन्म जन्म के बाद 11वें या 21वें दिन की जाने वाली पूजा। बधाण पूजा आपने भी कई बार देखी होगी हो सकता है प्रान्त अनुसार अलग हो लेकिन होती सभी जगह है। यह पूजा का साथ भी हर परिवार का अलग और निश्चित होता है। अक्सर दादा हमे अपने साथ लेकर जाया करते थे।  जंगलो से घास लाना घर की बहू और बेटियों का ही कार्य था, लेकिन ऐसा नही कि मर्द न जाते हो मर्द भी जाया करते थे। जंगलो में घास काटते हुए महिलाये गीत गाते हुए वादियों को गुंजाया करती थी। घास लेने जाने से पहले अक्सर सभी महिलाएं किसी एक स्थान पर इंतज़ार करती और इस स्थान को पलिन्थरा कहा जाता था। इस स्थान पर सभी अपनी दराती को धार लगाया करती ये पत्थर पर घिसने से खूब धारदार कर दिया करती थी अपनी अपनी दराती को।  बरसातों के समय जंगलो में च्यूं(मशरूम के भिन्न भिन्न प्रकार) स्वतः ही निकल जाए करते थे, इन्हें लेने सुबह सुबह छाता लेकर हम चल दिया करते। ऐसे मौसम में जौक(एक प्रकार का कीड़ा जो शरीर के जिस हिस्से से चिकत है खून के साथ ही छोड़ता है और तंब…

Kya ye wahi pahar hai? Part 2 क्या ये वही पहाड़ है? भाग 2

क्या ये वही पहाड़ है?
भाग 2

गतांक से आगे........
कक्षा दो में प्रवेश और अब पाटी दावत के साथ थोड़ा आगे बढ़े बचपन से ही घड़ी का बड़ा शौक था, मेरी पहली घड़ी कक्षा 2 में नाना जी ने दी क्या घड़ी थी अहा काला पट्टा बीच मे एक चौकोर घड़ी जिसमे टिप टिप करते दो बिंदु घड़ी देखते देखते समय बीत जाया करता था। रात को चिमनी में पढ़ाई करना दो अक्षर पढ़ते ही नींद आना भी एक बहाना था। मुझे याद है मैं अपनी नानी के घर गया हुआ था तो वहां मुझे स्कूल भेज दिया गया वहां थोड़ा अलग तरह से गिनती सिखाई जाती थी शायद अब हो या न हो कह नही सकता 1 से 9 तक तो साधारण वही था वहां भी और हमारे यहां भी लेकिन आगे हम सीधे ही 10, 11, 12 बोल दिया करते थे वहां सुनी तो बड़ा अजीब लगा वहां एक अर शून्य दस, एक और एक ग्यारह, एक अर दो बारह, कुछ ऐसे था। हम कुमाऊँ दुशान क्षेत्र से और नानी का गांव बीरोंखाल ब्लॉक में पौड़ी गढ़वाल में, वहां की भाषा बहुत सॉफ्ट लगती थी मुझे कोई लड़का भी बात करता तो ऐसा लगता जैसे कोई लड़की ही बात करती हो। हमारी बोली जरा कठोर सी है जिसमे थोड़ा भारीपन होता है।
गुड़ और रोटी का स्वाद क्या स्वाद होता था, सुबह रात की बची बासी रोटी और चा…

Kya ye wahi pahar hai? क्या ये वही पहाड़ है?

क्या ये वही पहाड़ है?
जिसे हमने अपने बचपन मे देखा था। जहा मेरा परिवार नही हमारा परिवार था, जहां हर घर मे हर किसी का कुछ न कुछ रिश्ता था। अगर गांव में किसी घर मे कोई परदेश से लौटता तो गांव के हर घर मे चने और मिठाई बांटी जाती थी। भुजेले(पेठा) कि मिठाई में जो स्वाद था वो आज के काजू कतली में कहा। क्या रौनक थी मेरे पहाड़ में।
घर होता उसका एक आंगन होता उसमे माँ चचिया मिलकर ओखली में वो धान कूट रही होती दोनो के हाथ मे गंज्यले(ओखली में प्रयुक्त होने वाले मोठे आकर के बंबू) होते, थोड़ी सी दूरी पर दादा बकरी बाँधने के लिए रस्सी तैयार कर रहे होते, वही उनके बगल में चिनखि(बकरी का बच्चा/ मेमना) अटखेलिया करता कभै दादा की पीठ पर चढ़ने के प्रयास करता तो कभै दौड़कर हमारे पास आ जाता कूदता फुदकता। थोड़ी सी दूरी पर छानी(गौशाला) के आंगन से गाय रंभा माँ....... रही होती। जरा महसूस करो यदि आप जरा भी गांव में रहे हो और आपने ऐसे जीवन को जिया है तो कैसा लग रहा है आपको।
इधर हम सभी भाई बहनों को भी तो देखो हम क्या कर रहे है, हम छोटे छोटे घर तैयार कर रहे है कोई पत्थर ला रहा है तो कोई मिट्टी पानी, ये देखो इधर ये छोटे साहब त…

Zindagi kuchh samjhana chahti thi ज़िन्दगी कुछ समझाना चाहती थी

जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी,
जो ना समझ सका अब तक,
वह तो स्वप्न में मुझे दिखाना चाहती थी।

ना राह मालूम थी, न मंजिल का ही पता था,
निकल पड़ा था ना जाने क्यों, मैं उस राह पर,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

राह भी कुछ अजीब थी,
मैं मंजिल से दूर, लेकिन वह मेरे करीब थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

राह में पथिक मिले, जो दूर तक संग चले,
फिर आगे राह मेरी अकेली थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

कुछ ऐसे मिले जिनपर भरोसा करना मुश्किल था,
भरोसा कर लिया, नही करना था,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

फिर से उन्हें छोड़ आगे बढ़ा राह भटका,
दूर एक लौ जलती दीख पड़ रही थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

मंज़िल नज़दीक, राह कठिन और,
अंजानो के बीच सफर अकेले तय करना था,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।


कर भरोसा तू सब पर मगर एक दायरे में,
आत्मविश्वास बनाये रख, धोखे भी है सफ़र में,
शायद यही जिंदगी मुझे समझाना चाहती थी।

अनोप सिंह नेगी (खुदेड़)
9716959339

Prabhat Feri प्रभात फेरी

स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं

आज विद्यार्थी जीवन के उन पलों की बहुत याद आती है, यू तो मैंने गाँव के विद्यालय में तीसरी कक्षा तक ही पढ़ा है लेकिन वो वक़्त आज एक अजीब सा एहसास दिलाता है। आज बात करूंगा जब हम 26 जनवरी गणतंत्र दिवस और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस में अपने स्कूल के नजदीक पूरे गांव में प्रभात फेरी करते थे सबसे आगे एक साथी तिरंगे को लेकर चलता और पीछे से गुरुजी हमे पंक्तिबद्ध करके इस फेरी का हिस्सा होते। यहां से हम अपने देश भारत की जय जय करते हुए नदियों, खेत-खलिहानों, और गाँव को गुंजाते आगे बढ़ते फिर किसी के भी आंगन में वृताकार तरीके से खड़े होकर देशभक्ति गीत गाते और फिर आगे बढ़ते हुए सभी एक स्वर में उस कविता को बोलते जो आपने जरूर पढ़ी होगी
"वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो"
कोई कोई गुड़ देते थे घर से और गुड़ कोई आज जैसे नही होता था, बल्कि  बड़ी भेली होती थी जो लगभग शायद ढाई किलो की होती थी। फिर स्कूल में वापिस लौटते और कार्यक्रम होता कार्यक्रम समापन के बाद जो गुड़ मिला होता था वो सभी विद्यर्थियों और अध्यापकों में बट जाया करता था।
आखिर में राष्ट्रगान और सारे जहा से अच्छा…

Pahar Veeran Ho Gaya पहाड़ वीरान हो गया

पहाड़ वीरान हो गया


जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया।

नित जो आंगन महकता रहा नित जो आंगन महकता रहा अरे वही सुनसान हो गया जो निवासी पहाड़ों का था अब वही मेहमान हो गया जिसने जीना सिखाया हमें वो पहाड़ वीरान हो गया।
जिस बगीचे ने पाला हमें
जिस बगीचे ने पाला हमें
वो बंदरों की जान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया।
Youtube Link जहां गूंजी छोड़ा चांचरी
जहां गूंजी छोड़ा चांचरी
अब सूअरों का गान हो गया
नित जो आंगन महकता रहा
अरे वही सुनसान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया।

ऐ खोलियों के मालिक सुनो
ऐ खोलियों के मालिक सुनो
कैसे फ्लैट शान हो गया
ऐ खोलियों के मालिक सुनो
कैसे फ्लैट शान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया।

जहां धान से…

Kaun Dhyan Dega कौन ध्यान देगा?

कौन ध्यान देगा?
कही पहाड़ खिसक रहा,
कही रोड़ धसक रही,
हम तुम कांग्रेस भाजपा की
लड़ाई में सफल हो रहे।
किन्तु वहां कौन ध्यान देगा?
जहा पहाड़ी सिसक रहा!
कही बादल फट रहा,
कही बाढ़ आ रही,
हम तुम फेसबुक पर
अनुमान लगा रहे।
किन्तु वहां कौन ध्यान देगा?
जहा पहाड़ी दम तोड़ रहा!





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कही जंगल जल रहा, कही सुरंगे खुद रही, हम तुम अलवेदर के सपनो के जाल में खो रहे। किन्तु वहां कौन ध्यान देगा? जहां पहाड़ी ज़िंदा दफन हो रहा!

कही दल बदल रहा,
कही विदाई हो रही,
हम तुम आस विकास के
खयाली नक्से तैयार कर रहे।
किन्तु वहां कौन ध्यान देगा?
जहां पहाड़ी अनाथ हो रहा!

कही रोहिंग्या स्थायी हो रहा,
कही शराब बिक रही,
हम तुम नशे की
बोतल में तैर रहे।
किन्तु वहां कौन ध्यान देगा?
जहा सौदा पहाड़ी का हो रहा!

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

Hamar Pahar हमर पहाड़

नामस्कार दोस्तो आज बहुत समय बाद अपनी यह रचना प्रेषित कर रहा हूं।
मेरी यह पहली कुमाऊनी रचना है कोशिश की है लिखने की यदि कुछ त्रुटियां रह गयी हो तो कृपया मार्गदर्शन जरूर कीजियेगा। https://khudeddandikanthi.blogspot.com/2018/07/hamar-pahar.html?m=1 *हमर पहाड़* म्यर पहाड़ त्यर पहाड़,
म्यर त्यर क झगड़ मै,
हरै गो छौ हमर पहाड़। गढ़ पहाड़ कुमौ पहाड़,
गढ़ कुमौ क बीचम,
उजड़ी गे छौ हमर पहाड़। हरो भरो छि कभै,
हमर यो सुंदर पहाड़,
अब रगड़ है गे छौ हमर पहाड़। गौ हमर बसै छि हमर पूर्वजुल,
अब नि रौ ग़ोई यू हमर पहाड़,
छूड़ डुट्याल बसी गो हमर पहाड़। द्याह(घर) उड़्यार है गो छ,
पहाड़ी नहै गो छोड़ी बेर पहाड़,
खौनार हैगो हमर पहाड़। बग्वाल भैलो उदंकार हुंछि कभै,
नान तिन लै रौनक रौ छि पहाड़,
अब अन्यारपट हैरो हमर पहाड़। चहल पहल खूब रौंछि कभै,
म्यल कौतिक की बहार हमर पहाड़,
अब सुनपट हैरो हमर सर पहाड़। कसी दुर्गति हैगो यो हमर पहाड़,
गाड(खेत) बांज हैगो हमर पहाड़,
अब कसिक व्हल खुशहाल हमर पहाड़। गाड़-धार सुखी गै छौ,
जंगव(जंगल) लै जगी गो छौ हमर पहाड़,
जसकसै बचै ल्यो दगड्यो यो हमर पहाड़।


अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

Stinning Nettle part-2 कण्डली भाग -2

कंडली stinning Nettle part-2काफी समय पहले मैं आज के इस वानस्पतिक लेख लिख चुका हूं उस वक़्त अधिक जानकारी नही थी किन्तु अब इसके बारे में काफी कुछ जान चुके हूं तो सोचा क्यों ना आप सभी के साथ भी इस जानकारी को सांझ किया जाए। पिछले लेख के लिए यहाँ क्लिक करे आज का मेरा लेख Stinning Nettle इस नाम से जो वाकिफ़ होंगे उनके शरीर मे रोंगटे जरूर खड़े हो गए होंगे। आखिर होंगे क्यो नही जो नाम जानते है शायद उनमे से बहुत से ऐसे भी होंगे जिन्होंने इसके असर को अनुभव भी जरूर किया होगा। अभी असर नही हुआ लो अब आपको एहसास दिलाते है, इसका नाम अलग अलग जगह अलग अलग है। उत्तराखण्ड में इसे कण्डली या या शिशोण के नाम से जाना जाता है हिमाचल नेपाल में इसे बिच्छू घास के नाम से जाना जाता है। अब हुआ असर अब जरूर असर हुआ होगा। विज्ञान की भाषा मे कण्डली को UrticaDeoica के नाम से जाना जाता है और यह Urticacae प्रजाति का पौधा है।
बात की जाए यदि इसकी खेती की तो भारत मे कही भी इसकी खेती नही की जाती है बल्कि यह बंजर जमीन या खेतो के किनारे रास्तो में स्वतः ही पैदा हो जाती है। जबकि यदि मैं बात करु इसकी व्ययसायिक खेती की तो विश्वभर में …

Ni Mildu नि मिल्दु

नि मिल्दु न चुल्लू मिल्दु, न चुल्लो आग मिल्दी,
न दाजी की अगेठी मिल्दी, न अगेठी रंगुणु मिल्दु।न मूला की थिचवाणी मिल्दी न मूला कु साग मिल्दु,
न डिगची कु झुंगरु मिल्दु, न पतेला कु भात मिल्दु।न ब्वाडा कु रेडू मिल्दु, न रेडू का सेल मिल्दा,
न काका कु जाल मिल्दु, न जालो माछा मिल्दा।न काकी की दथुड़ी मिल्दी, न डांडियू घास मिल्दु,
न गागर मिल्दी, न पंदेरू पाणी मिल्दु।ना घासा गडोली मिल्दी, न घसेन्यु की टोली मिल्दी,
न हैल मिल्दु, न हैला का जुआ लाठ मिल्दा।न जंदरू मिल्दु, न जंदरा का पाट मिल्दा,
न उरख्यलु मिल्दु, न गंज्यला मिल्दा।न गौड़ी भैंसु को रामणाट मिल्दु, न ढेबरा बखरो कु दुदराट मिल्दु,
न कीला ज्युड़ा मिल्दा, न छन-गोठयार मिल्दा।
        यख मिल्दु त बस!!!!खौन्दार कुड़ी, बांजी पुंगड़ी, बांदरो को जबलाट, मुसो कु दुदराट, सुनसान गाँव, झुमझाम पहाड़,
वीरान डाँडी, सूखी नयार, आणमिला सा मनखी अर सूखा गाड़ धार!!!!!

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

Rajju Bisht रज्जु बिष्ट

बाँदु का लस्का ढस्का देखी औला
दिल मेरु खुदेणु चा हे रेणु तेरी याद मा
सतेश्वरी तेरी माया मा बौल्या बणी ग्यु
तेरा बाना सोचणु रौ
पदम सिंह गाड़ी लेई खेतुसैण बटी
बस मा किलै नि राई
हाथा कु रुमाल छुटिगे पानी पंदेरे मा
हाथ मा मोबाइल पौड़ी बाजार
त्यारा सौ मि त्वेतै इतगा प्यार करुलु
माटा की मटुकी गोरख्यो की चेली सांतुला         ये सभी गीत शायद आपने खूब सुने होंगे लगभग एक-दो  दशक पहले ऐसे गीतों को उस वक्त खूब सराहा जाता था। पहाड़ो में ये आवाज खूब गुंजा करती थी, लेकिन जब कुछ दौर बदला कैसेट ने सीडी की जगह ली सीडी ने डीवीडी और फिर मोबाइल में मेमोरी कार्ड ने और अब तो सबकुछ यूट्यूब तक ही सीमित रह गया।
इन गीतों के नाम पढ़कर शायद आप समझ ही गये होंगे कि आज मैं बात करने वाला हूं एक ऐसे लिख्वार की एक आवाज के धनी गायक की जिसे मैं कभी व्यक्तिगत तो नही मिला लेकिन इनके गीतों को खूब सुना करता था। दोस्तो ये है उत्तराखण्ड के गायक रज्जु बिष्ट जी। ऐसे तो इनके गीत सभी बेहतरीन है। जिनमे संदेश होता है, लेकिन आज मैं बात करने वाला हूं उन गीतों की जो उत्तराखण्ड में पहाड़ो में खूब गूंजते थे। शादियों में म्यूज़िक बैंड में खू…

Maa माँ

मेरी यह रचना समर्पित मेरे उन साथियो को जो परदेशो में दूर है अपने परिवार से खासकर उनको जो अपनी माँ से दूर है।
आशा है मेरी ये रचना आपको पसंद आएगी।हैरान हूं परेशान हूं,
जो सोचता हूं सब विपरीत ही पाता हूं।
मैं तुझसे तू मुझसे है क्यों दूर,
आज तक समझ नही पाया हूं।वो सब तो है मेरे पास,
जो मैं पाना चाहता हूं।
जाने फिर भी क्यों तुझसे दूर रहता हूं,
बस यही सोचकर मैं खोया सा रहता हूं।नजाने कब वो दिन आएगा,
कि मैं तेरे पास आ जाऊ।
गोद मे तेरे सर रखकर,
तुझसे खूब बतलाऊ।हा तू 'माँ' ही तो है मेरी!
तुझ बिन अब मैं रह नही पाता हूं।
बस कुछ मजबूरियां है मेरी,
जो तुझसे दूर रहने पर मजबूर हो जाता हूं।मुझे देख देख तू जिया करती थी,
आज तुझे देख मैं जीना चाहता हूं।
अब तेरे पास हमेशा के लिए,
लौट मैं जाना चाहता हूं।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

Red Rice लाल चावल

लाल चावल Red Riceनमस्कार मित्रो आज बात करेंगे एक ऐसे अनाज की जो लगभग देशभर में ही नही पूरे संसार मे सभी जानते है और सभी खाते भी होंगे। बस रूप और गुण भिन्न हो सकते है। जी हां दोस्तो आज बात करेंगे चावल की। यू तो चावल को अधिकतर बीमारी के रूप में ही जाना जाता है किंतु आज हम इसके दोषों के आगे बढ़कर इसके गुणों की बात करेंगे। चावल भी वो जो विश्व प्रसिद्ध है इस चावल को हम रेड राइस के नाम से अधिक जानते है। चावल की विश्वभर में व्यावसायिक खेती की जाती है ये तो आप सभी जानते ही होंगे।
उत्तराखण्ड में शादी के समय भी इस चावल का खूब प्रयोग किया जाता है।
लाल चावल जिसे पौष्टिक रूप में सबसे बेहतर पाया जाता है, ये भारत मे पहाड़ी राज्यो के अलावा झारखंड, तमिलनाडु, केरल व बिहार में अधिक पाया जाता है। इस चावल की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में खूब मांग रहती है। भारत मे लाल, बैंगनी, भूरे व हरे चावलों का उत्पादन किया जाता है। उत्तराखण्ड में मुख्य रूप से लाल चावल की खेती की जाती है। केरल व तमिलनाडु में लाल चावल को उमा नाम से जाना जाता है।
अन्य चावलों की पॉलिशिंग के समय मे कम हो जाते है, जबकि लाल चावल में ये …