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Kya ye wahi pahar hai? Part 2 क्या ये वही पहाड़ है? भाग 2

क्या ये वही पहाड़ है?
भाग 2

गतांक से आगे........
कक्षा दो में प्रवेश और अब पाटी दावत के साथ थोड़ा आगे बढ़े बचपन से ही घड़ी का बड़ा शौक था, मेरी पहली घड़ी कक्षा 2 में नाना जी ने दी क्या घड़ी थी अहा काला पट्टा बीच मे एक चौकोर घड़ी जिसमे टिप टिप करते दो बिंदु घड़ी देखते देखते समय बीत जाया करता था। रात को चिमनी में पढ़ाई करना दो अक्षर पढ़ते ही नींद आना भी एक बहाना था। मुझे याद है मैं अपनी नानी के घर गया हुआ था तो वहां मुझे स्कूल भेज दिया गया वहां थोड़ा अलग तरह से गिनती सिखाई जाती थी शायद अब हो या न हो कह नही सकता 1 से 9 तक तो साधारण वही था वहां भी और हमारे यहां भी लेकिन आगे हम सीधे ही 10, 11, 12 बोल दिया करते थे वहां सुनी तो बड़ा अजीब लगा वहां एक अर शून्य दस, एक और एक ग्यारह, एक अर दो बारह, कुछ ऐसे था। हम कुमाऊँ दुशान क्षेत्र से और नानी का गांव बीरोंखाल ब्लॉक में पौड़ी गढ़वाल में, वहां की भाषा बहुत सॉफ्ट लगती थी मुझे कोई लड़का भी बात करता तो ऐसा लगता जैसे कोई लड़की ही बात करती हो। हमारी बोली जरा कठोर सी है जिसमे थोड़ा भारीपन होता है।
गुड़ और रोटी का स्वाद क्या स्वाद होता था, सुबह रात की बची बासी रोटी और चाय और खाली गिलास से
चायपत्ती को निकालकर खाना। घर मे चारो तरफ पोस्टर और अखबार चिपके होते थे। पिताजी की चिट्ठी का इंतज़ार और जब चिट्ठी आती उसे परिवार के सभी सदस्यों के बीच बैठकर अक्षर मिला मिला कर पढ़कर सुनाना। फिर अगले दिन उस चिठ्ठी का जवाब लिखना शुरुआत परम पूज्यनीय जैसे शब्दों से करना चिठ्ठी का। अब सब लुप्त हो गया। सुबह शाम को रेडियो पर आकाशवाणी नज़िबाबाद केंद्र से समाचार का प्रसारण, फिर शाम 8:45 पर हवा महल कार्यक्रम सुनना। रात को दादा या दादी से कहानी सुनना अक्सर वो कहानी तो शायद बहुत से उत्तराखंडी साथियों ने सुनी होगी "चल तुमड़ी बाट्या बाट"। क्या दिन हुआ करते थे गाय बकरी चराने
जाओ तो किसी की भी कखड़ी(पहाड़ी खीरा) चोरी करके खाना, तैयारी एक दिन पहले ही हो जाती की कल किसका खीरा चोरी होगा उसके लिए घर से सिलबट्टे में पिसा नमक लेकर जाना। नहाने का भी एक अलग अनुभव अब कहा वो बात कलकल बहती नदियां और उनमें डुबकी लगाते तैरने वाले तो कही भी पहुँच जाते लेकिन हम तो बच्चे ठहरे उस वक़्त हम किनारे में ही नहा लेते ठंड लगती तो ऊपर आकर चट्टानी बड़े पत्थरो पर लेट जाते थोड़ी देर बाद फिर नदी में कूद लेते।
कोलगेट के बदले कोयले से भी काम चला लिया करते। शायद आप मेरी अगली पंक्ति को पढ़कर हँसोगे भी क्योकि पंखे का मतलब तो हम ये समझते थे कि जो लोग पैडल मारकर चलाते थे जिसके उपयोग गेहूँ की मंडाई के बाद उससे भूसा अलग करने के लिए करते थे। पंखा तो पहली बार जब गांव से दिल्ली के लिए आ रहा था तो रामनगर में देखा लेकिन इसका उपयोग क्या है और कहते क्या है तब भी पता नही था। इसका उपयोग तो दिल्ली पहुँचकर ही पता चला।
खैर बात गाँव की चल रही है तो क्यो शहर की बात की जाए वापिस गाँव चलते है।
गाँव मे शादी है एक महीने पहले से तैयारियां शुरू लकड़ी लानी है जंगल मे एक दो पेड़ काटने है उनके बदले नए पेड़ भी लगाना। शादी वाले घर मे चहल पहल वहां कामकाज में मदद करना पूरा गांव अपना फर्ज स्वयं समझता था। शादी में चाय के साथ बिस्कुट, नमकीन और लड्डू और फिर सौंफ सुपारी के पाऊच, क्या दिन थे। कही बारात में चले जाते तो बड़ो को दो रुपये और छोटो को 1 रुपये शिष्टाचार टीके के संग लगता था। बारातियों को खिलाने के बाद ही गांव के लोग खाया करते थे। अब तो बारात पहुचती नही तब तक खाना सब साफ हो चुका होता है। बारात में दूल्हे-दुल्हन के दोस्त सखियों की मज़ाक ठिठोली और गीत के माध्यम से गालियां। और सभी कार्य संपन्न होने के बाद रात को बारात गांव में ही रुकती थी तो रातभर वीसीआर चलाया जाता। सुबह विदाई होती। बारात में नगर-निशाण, ढोल-दमाऊ, रणसिंगा(वाद्य यंत्र) और इन ढोल दमाऊ की थाप पर ठुमक ठुमक अपने करतब दिखाते सरयंकार(छोलिया नृत्य) अहा क्या आनंद आया करता था इसमें अब वो बात नही। सभी बाराती दुल्हन को लेकर एक साथ वापिस लौटते थे अब तो बस फॉर्मेलिटी हो गया ये सब। चांदण(टैंट) खुलता तो उसके नीचे पहले से ही घुस जाना और फिर इसके अंदर से उलझते हुए बाहर आना भी एक खेल था हमारा। पितरों व कुल देवी-
देवताओं की पूजा करना समय निश्चित रहता था। डौर, हुड़के(देवताओ के आह्वान के लिए प्रयुक्त होने वाला वाद्य यंत्र) की थाप और कांसे की थाली की झनकार पर थिरकते थे देवी देवता। जागर मंडाण जातरा जैसे दैवीय कार्यो का आयोजन समय समय पर होते रहते। गांव में पुजै भी खूब हुआ करती थी बड़े मंदिर तो नही थे लेकिन जहां पत्थर भगवान मां पूजा जाता था, छोटे छोटे थान बने थे कही पर भूम्या का थान कही पर गोरिल देवता का कही हीत का हरि देवता का थान होता और उन्हें पूजा जाता था। कोई गांव से बाहर जाता तो इन थानों में माथा टेकने जरूर जय करता था और अपनी श्रद्धा अनुसार भेंट चढ़ाकर आता था। वक़्त वक़्त पर मेले लगते थे, इन मेलो में बहुत दिनों से नही मिले लोग आपस मे मिला करते थे।
ये मेले उन विवाहित महिलाओं के लिए और अधिक महत्वपूर्ण होते थे जब दूर ससुराल होने के कारण मायके जाने में असुविधा होती और मेला उनके मैत और सौरास के मध्य कही होता तो चेहरों पर अलग ही खुशी चमकती थी। अपने मैत वालो से भेंट जो होने वाली होती थी। "न बैठ बिंदी न बैठ चरखी मा" गीत और चरखी में झूलते हम आज की तरह मॉर्डन झूले तो नही थे लेकिन हाथ से घूमने वाले और झुलाने वाले झूलो का अपना एक अलग ही मज़ा होता था।
जलेबी मेलो में खास हुआ करती थी, 5 रुपये लेकर मेला घूम लिया करते थे आज 500 भी कम पड़ जाते है।
रामलीला कई जगह आज भी रामलीला तो आपने बहुत देखी होगी लेकिन पहाड़ो में रामलीला में न सिर्फ डायलॉग होते थे बल्कि चौपाई भी गायी जाती थी हारमोनियम की धुन से स्वर मिलाते हुए। छबि राजा और उसके सेवक हवा भरते हुए जनता को खूब गुदगुदाया करते थे। तब रामलीला रात को शुरू होती और सुबह खत्म होती थी लेकिन अब शाम को शुरू और 10 बजे रात को ही खत्म हो जाती है।
दीवाली की रात भी खूब जगमगाती थी बिजली की लड़ियों से नही बल्कि दियो से और भैलो(चीड़ के पेड़ के कुछ हिस्सों से गोंद लगा टुकड़ा) से इनके छोटे छोटे गठ्ठर बना रस्सी में बांध जलाकर घुमाना और इसमे भी अलग अलग करतब दिखाया करते थे पटाखों और लड़ियों की दीवाली तो अब हुई हम तो इनसे ही खुश हो जाते थे। मिठाई, चॉकलेट बांटकर नही और न ही मैसेज भेजकर बल्कि प्रेम और घर मे पके पकवान बांटकर त्यौहार मनाया जाता था।

क्रमशः..................
अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339


भाग १ 

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