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Kya ye wahi pahar hai? Part-4 क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4

क्या ये वही पहाड़ है?
भाग-4
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आज उस पहाड़ की बात करूंगा जो हमारा इंतज़ार करते करते हताश हो चुका है। जहा से हम रोज़गार के लिए, शिक्षा के लिए  पहाड़ो से आये थे, लेकिन हम उस गांव को उस पहाड़ को इस तरह भुला देंगे ये तो शायद तब सोचा भी नही होगा। लेकिन सच्चाई यही है हम अपना गांव छोड़ चुके है। आज के इस भाग में मैं बात कर रहा हूं "डुटियाल जी प्रधान"  एक लघु फ़िल्म जिसे देखने वाले तो शायद सिर्फ अपने खाली वक़्त में इसे समय दे रहे होंगे देखने के लिए, लेकिन इसे लिखने वाले लेखक ने इसमे काम करने वाले किरदारों ने पहाड़ से लगातार हो रहे पलायन से रूबरू करवाने का प्रयास किया है। हम पहाड़ी परदेशियों को आइना दिखाया है। आज पहाड़ की यादों को नही हक़ीक़त को लिखने का प्रयास कर रहा हू आशा है आपको पसंद आएगा।
इस 22 मिनट की छोटी सी फ़िल्म का सारांश लिखने से पहले इसके सभी कलाकारों निर्माता निर्देशक का धन्यवाद करना चाहूंगा। और उनके नाम यहां दे रहा हूं।
यह 22 मिनट 2 सेकेंड की फिल्म हमे बहुत कुछ समझाती है एक बार जरूर देखिएगा।
इसका कांसेप्ट और लेखक है त्रिभुवन उनियाल, निर्मात्री सरिता बिष्ट, निर्देशक बेचैन कंडियाल, सह-निर्देशक बिन्तेश्वर बलोदी, संपादक अनिल बिष्ट, कैमरा के के शर्मा,
आवाज़(डबिंग में)- संदीप(चिल्बिट), त्रिभुवन उनियाल, बिजेंद्र राणा, नागेंद्र बिष्ट, शोभा रावत, इंद्र मोहन चमोली, टप्पू।
कलाकार-
राम रतन काला, सतीश सुन्द्रियाल, जगत किशोर बड़थ्वाल, सुनील आर्या, सतेश्वरी भट्ट, व बसंती नेगी।
बैनर - अनिल बिष्ट एंटरटेनमेंट
संस्था - गढ़ कला सांस्कृतिक संस्था पौड़ी।
ये सभी इस फ़िल्म के पात्र है कुछ कैमरे के सामने तो कुछ कैमरे के पीछे इनके अलावा और भी हो सकते है, मुझे चैनल पर जो नाम मिले है उनका विवरण दिया है, हो सकता है इनमे से किसी को मैं जानता हूं और किसी को नही।
इस फ़िल्म को देखकर इतना तो पता चलता है कि वर्तमान जैसा भी हो लेकिन भविष्य ऐसा ही होने वाला है। एक नेपाली(डुट्याल) काम की तलाश में हमारे पहाड़ो में आता है और वही उसकी पुश्ते बीत जाती है। उस नेपाली की इतनी हिम्मत हो जाती है कि वो प्रधान का चुनाव लड़ता है और जीत भी जाता। इसके लिए जिम्मेदार वो है जिसने अपने स्वार्थ के लिए उसे इस चुनाव में खड़ा किया और उस गाँव के आदमी को धोखा दिया जो शायद बिना विरोध के ही प्रधान चुना जाता। वो बाहर का होकर हमारे वर्तमान प्रधानों पर सवाल उठाता है कि कैसे वो पुराने किये कामो पर ही लीपा पोथी करके सरकार से आने वाले विकास खर्च को अपने जेब मे डाल लेता है। आज डुट्याल बोलने पर हमारे पहाड़ियों को कैसे आँख दिखा रहे है ये लोग इसमे यह भी दिखाया गया है।
गांव में हो रहे किसी विवाह आदि के काम मे वो प्रधान जो हमारे देश का नही है वो कहता है कि कोई कमी तो नही है कोई खाने पीने की परेशानी हो तो मुझसे या मेरी ससणी(पत्नी) से बोल देना साथ मे एक तंज़ भी देता है, पीने की कमी नही होने दूंगा।
अब एक परदेशी पहाड़ी गाँव मे आता है प्रधान के घर पंहुचता है और प्रधान को बुलाता है अंदर से नेपाली निकलकर आता है और कहता है मुई प्रधान हूँ। ये सुन वो परदेशी उससे बार बार कहता है कि प्रधान को बुला दे लेकिन वो कहता है मैं ही प्रधान हूं। दोनो में झगड़ा भी हो जाता है जो साब जी साब जी कर रहा था वो उस पहाड़ी पर हाथ भी उठाने लगता है। बीच बचाव में वही हारा हुआ प्रधान आकर उस परदेशी को समझाता है कि यही प्रधान है तब उस पहाड़ी के समझ मे आता है कि ये नेपाली सही कह रहा है। फिर आगे और भी चौकाने वाली बात उस परदेशी को पता लगती है कि ये नेपाली जिस घर मे वो रहता है वो उसका ही घर है, उसके दादा कभै यहां के थोकदार हुआ करते थे, और आज पोता अपने घर के आंगन में खड़ा है वो भी एक मूल निवास प्रमाण पत्र के लिए। ये कितनी बड़ी विडंबना है कि जो इस गाँव का निवासी था जिसके पूर्वजो ने इस गांव को बनाया आज वो अपने बनाये पूर्वजो के घर के बाहर खड़ा होकर एक निवास प्रमाण पत्र ले रहा है वो भी उस आदमी से जो शायद यहा का हकदार भी नही था। मन बहादुर थापा जो बाहर से आकर बसा और प्रधान बना वो हमें ये सुनिश्चित कर रहा है कि हम उसी गांव के मूल निवासी है जिस गांव में आये उसे अभी कुछ ही समय हुआ है।
यह तो सिर्फ एक उदाहरण है प्रधान का लेकिन आज पूरे उत्तराखंड में यही हो रहा है। कही नेपाली तो कही रोहिंग्या तो कही कोई अन्य बस रहे है। और नेताओं के चमचे इनके सभी दस्तावेज तैयार कर रहे है। और फिर उनको उनका हक क्या है इस देश मे इस पहाड़ में उन्हें यह भी बता रहे है। जैसे इस फ़िल्म में उस आदमी ने नेपाली को प्रधान बनाने के लिए उसे उसके अधिकार बताये और फिर उसे प्रधान बना दिया। यहाँ मानसिकता उस आदमी की भी देखी जा सकती है किस तरह उसने अपने गांव के आदमी को धोखा दे दिया उसके साथ खुद को खड़ा दिखाकर। और यही होता भही है आज हमारे गांव में रहने वाले लोग प्रदेश में रहने वालों को तंज ऐसे ही देते है जिस कारण से भी बहुत लोग गांव को जाने से पहले कई बार सोचते है और फिर जाना छोड़ देते है।
अब जल्द ही रोहिंग्या भी यहां अपना हक लेने वाले है क्योंकि एक रावत बसा गया तो दूसरा रावत उनके दस्तावेज़ तैयार करवा रहा है। अब वो दिन भी दूर नही जब डुट्याल के बाद किसी गांव में रोहिंग्या भी प्रधान बना होगा। इस फिल्म में नेपाली प्रधान और परदेशी पहाड़ी की बहस को सभी लोग कॉमेडी समझकर उनकी इस बहस का हसी ठहाको के साथ लुत्फ़ उठा रहे है लेकिन इस फिल्म का सबसे गहरा सोचनीय चिंतनीय विषय यही पर दर्शाया गया है। इस फिल्म को इस जगह पर गभीरता से देखना और भी जरुरी हो जाता है कि आखिर हम कहा है।
यहां पर शायद उस नेपाली की कोई गलती नही है अगर कोई गलत है तो वो मैं हूँ, तुम हो जिनके जो हम उस गाँव को छोड़ आये और दुबारा लौटकर नही गए। मैं तो निश्चित ही हू क्योकि मुझे भी अपने गांव गए कई साल हो चुके है। मेरे बच्चों ने एक या दो बार ही अपना गांव देखा है।
अक्सर बड़े पर्दे की फिल्मो को हम अधिक तव्वजो देते है लेकिन सीख तो हमे ऐसीही छोटी छोटी फिल्मे भी दे जाती है। प्रदीप भण्डारी जी, भगवान चंद जी की लघु फिल्मो में भी आपको ऐसा ही दर्द देखने को मिल जायेगा और अनुज जोशी जी की फिल्मे भी आपने देखी ही होंगी।
दोस्तो एक बार इस फ़िल्म को जरूर देखना समझना और इसपर विचार करना।

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

भाग 1                                                             भाग 2                                                                       भाग 3 

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या किस को बोलो आप पहाड़ों से क्यों आये सहर तो बोलेंगे उस जमाने मे पहाड़ों में कुछ था नही आज तो बहुत दूर नही पहाड़।
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