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Showing posts from August, 2018

Sab Khandwar Sab Lampsar सब खंद्वार सब लम्पसार

सब खंद्वार सब लम्पसार





अंद्वार जो छा यख
सब बणिगीं उंदै का
मायादार ।
सर्या गौं मा
कूडि पचास
आदिम चार ।
ढक्यां छी
घर घरु मा
छैंदा मवसि
का द्वार ।
म्यार मुल्क की
ई च अब
तिसलि अंद्वार ।
सग्वडि पत्वडि
बांझि प्वडि छीं
मनखि बताणा
अफ्थै हुश्यार ।
घुर्तम घुर्त्यो
कैरिकी खूब
चिताणा छी
चलक्वार ।
सिकासैरियूंमा
बिराणा छी
स्यो त्यार
यो म्यार ।
द्यख्ये जावा त
सुद्दि कुछ ना
सब खंद्वार
सब लम्पसार ।।


वीरेन्द्र जुयाळ "उप्रि" उर्फ अजनबी

World Environment Day Song of Uttarakhand

Kya ye wahi pahar hai? Part-4 क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4

क्या ये वही पहाड़ है? भाग-4 -------------------------------------------------------------------------

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आज उस पहाड़ की बात करूंगा जो हमारा इंतज़ार करते करते हताश हो चुका है। जहा से हम रोज़गार के लिए, शिक्षा के लिए  पहाड़ो से आये थे, लेकिन हम उस गांव को उस पहाड़ को इस तरह भुला देंगे ये तो शायद तब सोचा भी नही होगा। लेकिन सच्चाई यही है हम अपना गांव छोड़ चुके है। आज के इस भाग में मैं बात कर रहा हूं "डुटियाल जी प्रधान"  एक लघु फ़िल्म जिसे देखने वाले तो शायद सिर्फ अपने खाली वक़्त में इसे समय दे रहे होंगे देखने के लिए, लेकिन इसे लिखने वाले लेखक ने इसमे काम करने वाले किरदारों ने पहाड़ से लगातार हो रहे पलायन से रूबरू करवाने का प्रयास किया है। हम पहाड़ी परदेशियों को आइना दिखाया है। आज पहाड़ की यादों को नही हक़ीक़त को लिखने का प्रयास कर रहा हू आशा है आपको पसंद आएगा।
इस 22 मिनट की छोटी सी फ़िल्म का सारांश लिखने से पहले इसके सभी कलाकारों निर्माता निर्देशक का धन्यवाद करना चाहूंगा। और उनके नाम यहां दे रहा हूं।
यह 22 मिनट 2 सेकेंड की …

Kya ye wahi pahar hai? Part - 3 क्या ये वही पहाड़ है? भाग - ३

क्या ये वही पहाड़ है?  भाग - 3 ---------------------------------------- बधाण/ बालण पुजै:- गाय या भैंस के बछड़ा/बछिया के जन्म जन्म के बाद 11वें या 21वें दिन की जाने वाली पूजा। बधाण पूजा आपने भी कई बार देखी होगी हो सकता है प्रान्त अनुसार अलग हो लेकिन होती सभी जगह है। यह पूजा का साथ भी हर परिवार का अलग और निश्चित होता है। अक्सर दादा हमे अपने साथ लेकर जाया करते थे।  जंगलो से घास लाना घर की बहू और बेटियों का ही कार्य था, लेकिन ऐसा नही कि मर्द न जाते हो मर्द भी जाया करते थे। जंगलो में घास काटते हुए महिलाये गीत गाते हुए वादियों को गुंजाया करती थी। घास लेने जाने से पहले अक्सर सभी महिलाएं किसी एक स्थान पर इंतज़ार करती और इस स्थान को पलिन्थरा कहा जाता था। इस स्थान पर सभी अपनी दराती को धार लगाया करती ये पत्थर पर घिसने से खूब धारदार कर दिया करती थी अपनी अपनी दराती को।  बरसातों के समय जंगलो में च्यूं(मशरूम के भिन्न भिन्न प्रकार) स्वतः ही निकल जाए करते थे, इन्हें लेने सुबह सुबह छाता लेकर हम चल दिया करते। ऐसे मौसम में जौक(एक प्रकार का कीड़ा जो शरीर के जिस हिस्से से चिकत है खून के साथ ही छोड़ता है और तंब…

Kya ye wahi pahar hai? Part 2 क्या ये वही पहाड़ है? भाग 2

क्या ये वही पहाड़ है?
भाग 2

गतांक से आगे........
कक्षा दो में प्रवेश और अब पाटी दावत के साथ थोड़ा आगे बढ़े बचपन से ही घड़ी का बड़ा शौक था, मेरी पहली घड़ी कक्षा 2 में नाना जी ने दी क्या घड़ी थी अहा काला पट्टा बीच मे एक चौकोर घड़ी जिसमे टिप टिप करते दो बिंदु घड़ी देखते देखते समय बीत जाया करता था। रात को चिमनी में पढ़ाई करना दो अक्षर पढ़ते ही नींद आना भी एक बहाना था। मुझे याद है मैं अपनी नानी के घर गया हुआ था तो वहां मुझे स्कूल भेज दिया गया वहां थोड़ा अलग तरह से गिनती सिखाई जाती थी शायद अब हो या न हो कह नही सकता 1 से 9 तक तो साधारण वही था वहां भी और हमारे यहां भी लेकिन आगे हम सीधे ही 10, 11, 12 बोल दिया करते थे वहां सुनी तो बड़ा अजीब लगा वहां एक अर शून्य दस, एक और एक ग्यारह, एक अर दो बारह, कुछ ऐसे था। हम कुमाऊँ दुशान क्षेत्र से और नानी का गांव बीरोंखाल ब्लॉक में पौड़ी गढ़वाल में, वहां की भाषा बहुत सॉफ्ट लगती थी मुझे कोई लड़का भी बात करता तो ऐसा लगता जैसे कोई लड़की ही बात करती हो। हमारी बोली जरा कठोर सी है जिसमे थोड़ा भारीपन होता है।
गुड़ और रोटी का स्वाद क्या स्वाद होता था, सुबह रात की बची बासी रोटी और चा…

Kya ye wahi pahar hai? क्या ये वही पहाड़ है?

क्या ये वही पहाड़ है?
जिसे हमने अपने बचपन मे देखा था। जहा मेरा परिवार नही हमारा परिवार था, जहां हर घर मे हर किसी का कुछ न कुछ रिश्ता था। अगर गांव में किसी घर मे कोई परदेश से लौटता तो गांव के हर घर मे चने और मिठाई बांटी जाती थी। भुजेले(पेठा) कि मिठाई में जो स्वाद था वो आज के काजू कतली में कहा। क्या रौनक थी मेरे पहाड़ में।
घर होता उसका एक आंगन होता उसमे माँ चचिया मिलकर ओखली में वो धान कूट रही होती दोनो के हाथ मे गंज्यले(ओखली में प्रयुक्त होने वाले मोठे आकर के बंबू) होते, थोड़ी सी दूरी पर दादा बकरी बाँधने के लिए रस्सी तैयार कर रहे होते, वही उनके बगल में चिनखि(बकरी का बच्चा/ मेमना) अटखेलिया करता कभै दादा की पीठ पर चढ़ने के प्रयास करता तो कभै दौड़कर हमारे पास आ जाता कूदता फुदकता। थोड़ी सी दूरी पर छानी(गौशाला) के आंगन से गाय रंभा माँ....... रही होती। जरा महसूस करो यदि आप जरा भी गांव में रहे हो और आपने ऐसे जीवन को जिया है तो कैसा लग रहा है आपको।
इधर हम सभी भाई बहनों को भी तो देखो हम क्या कर रहे है, हम छोटे छोटे घर तैयार कर रहे है कोई पत्थर ला रहा है तो कोई मिट्टी पानी, ये देखो इधर ये छोटे साहब त…

Zindagi kuchh samjhana chahti thi ज़िन्दगी कुछ समझाना चाहती थी

जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी,
जो ना समझ सका अब तक,
वह तो स्वप्न में मुझे दिखाना चाहती थी।

ना राह मालूम थी, न मंजिल का ही पता था,
निकल पड़ा था ना जाने क्यों, मैं उस राह पर,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

राह भी कुछ अजीब थी,
मैं मंजिल से दूर, लेकिन वह मेरे करीब थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

राह में पथिक मिले, जो दूर तक संग चले,
फिर आगे राह मेरी अकेली थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

कुछ ऐसे मिले जिनपर भरोसा करना मुश्किल था,
भरोसा कर लिया, नही करना था,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

फिर से उन्हें छोड़ आगे बढ़ा राह भटका,
दूर एक लौ जलती दीख पड़ रही थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

मंज़िल नज़दीक, राह कठिन और,
अंजानो के बीच सफर अकेले तय करना था,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।


कर भरोसा तू सब पर मगर एक दायरे में,
आत्मविश्वास बनाये रख, धोखे भी है सफ़र में,
शायद यही जिंदगी मुझे समझाना चाहती थी।

अनोप सिंह नेगी (खुदेड़)
9716959339

Prabhat Feri प्रभात फेरी

स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं

आज विद्यार्थी जीवन के उन पलों की बहुत याद आती है, यू तो मैंने गाँव के विद्यालय में तीसरी कक्षा तक ही पढ़ा है लेकिन वो वक़्त आज एक अजीब सा एहसास दिलाता है। आज बात करूंगा जब हम 26 जनवरी गणतंत्र दिवस और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस में अपने स्कूल के नजदीक पूरे गांव में प्रभात फेरी करते थे सबसे आगे एक साथी तिरंगे को लेकर चलता और पीछे से गुरुजी हमे पंक्तिबद्ध करके इस फेरी का हिस्सा होते। यहां से हम अपने देश भारत की जय जय करते हुए नदियों, खेत-खलिहानों, और गाँव को गुंजाते आगे बढ़ते फिर किसी के भी आंगन में वृताकार तरीके से खड़े होकर देशभक्ति गीत गाते और फिर आगे बढ़ते हुए सभी एक स्वर में उस कविता को बोलते जो आपने जरूर पढ़ी होगी
"वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो"
कोई कोई गुड़ देते थे घर से और गुड़ कोई आज जैसे नही होता था, बल्कि  बड़ी भेली होती थी जो लगभग शायद ढाई किलो की होती थी। फिर स्कूल में वापिस लौटते और कार्यक्रम होता कार्यक्रम समापन के बाद जो गुड़ मिला होता था वो सभी विद्यर्थियों और अध्यापकों में बट जाया करता था।
आखिर में राष्ट्रगान और सारे जहा से अच्छा…

Pahar Veeran Ho Gaya पहाड़ वीरान हो गया

पहाड़ वीरान हो गया


जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया।

नित जो आंगन महकता रहा नित जो आंगन महकता रहा अरे वही सुनसान हो गया जो निवासी पहाड़ों का था अब वही मेहमान हो गया जिसने जीना सिखाया हमें वो पहाड़ वीरान हो गया।
जिस बगीचे ने पाला हमें
जिस बगीचे ने पाला हमें
वो बंदरों की जान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया।
Youtube Link जहां गूंजी छोड़ा चांचरी
जहां गूंजी छोड़ा चांचरी
अब सूअरों का गान हो गया
नित जो आंगन महकता रहा
अरे वही सुनसान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया।

ऐ खोलियों के मालिक सुनो
ऐ खोलियों के मालिक सुनो
कैसे फ्लैट शान हो गया
ऐ खोलियों के मालिक सुनो
कैसे फ्लैट शान हो गया
जो निवासी पहाड़ों का था
अब वही मेहमान हो गया
जिसने जीना सिखाया हमें
वो पहाड़ वीरान हो गया।

जहां धान से…