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Showing posts from July, 2015

कलम मेरी

आज वे पहाड़ की गाथा लिख कलम मेरी
वू ढुंगो पर लगी चोट लिख कलम मेरी आज पहाड़ की वेदना लिख कलम मेरी
यु बांजा पुंगड़ो की आस लिख कलम मेरी सूखा गदनो की प्यासी धरती की प्यास लिख कलम मेरी
दानी आँख्यु की आस लिख कलम मेरी कैकि खुद मा बीती सारी रात लिख कलम मेरी
आंदारा जांदरो मा मेरु रैबार लिख कलम मेरी बग्वाली का भैलो की आग लिख कलम मेरी
रुआँसी माँ की हर एक साँस लिख कलम मेरी हैल लगांद आंदी छौ ज्वा खैरी आज लिख कलम मेरी
ब्यो बारात मा स्याल्यु की गाली आज लिख कलम मेरी
पहाड़ की याद मा इनी मिठास लिख कलम मेरी
एक बार जु चाखि ल्यो फिन कभी न भूलो कुछ खास लिख कलम मेरीबोल्दु का गालो मा खांकर कु गणमणाट लिख कलम मेरी
पंदेरो मा पंदेन्यु की छुयु कु गुमणाट लिख कलम मेरीयाद ऐ जा मेरा खुदेड़ भाइयो थै खुदेड़ डाँडी काँठी की
कुछ इन बात लिख कलम मेरीअनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
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मेरा सुख दुःख

मेरी कविता मेरी ज़ुबानी नौ मेरु अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
जन्म दिल्ली प्रदेश मा लीनी (21 जुलाई 1984)
पहली बार देवभूमि उत्तरखण्ड का दर्शन सन् 86 मा व्हेनि।
बचपन बीती मेरु गाँव बजरखोड़ा।
पट्टी - बिचला चौकोट, तत्कालीन ब्लॉक - स्याल्दे, पत्रालय- कुलांटेश्वर, जिल्ला - अल्मोड़ा।
यू गाँव-गल्यो मा मेरु बचपन खेलि की बडु होइ
यखी डाँडी काँठयु गोर चरै मिल
आज भी मन कब्लान्दु च याद करी वो दिन।
तीन पास करी की दुबारा उंदु ऐग्यो
बड़ा लाड प्यार से माँ-पिताजी, दादा दादी नि बडु करयु।
सपना त उंका छाया मीथै बहुत कुछ बणाणा का
पर मी उंका सपनो कु मोल नि दे सकु अर तीन साल नौ मा ही रैग्यो।
तिसरा साल नौ पास करी दस भी पास व्हेगी
नौकरी का तलाश मा मी लगी।
छोटी भुली से उम्मीद छै वा कुछ करली
पर आश तोड़ी वा हमसे कुछ जादा ही दूर चलिगि।
खानदान मा कुई छाई ज्वा सबसे पैली बारह म ग्यायि
पर विधाता थै कुछ और ही मंज़ूर छाई।
पर जैदिन वा ग्यायि झणि किलै मीथै निंद भी नि आई
अब सबसे छोटी भुली भी बड़ी व्है ग्यायि
वील त कम से कम माँ-पिताजी की इज़्ज़त रखी द्याई।
अब एक बार फिर जमना की ठोकर खैकि मिल पढ़ै शुरू काई
द्वी हज़ार छै मा मिल बारह पास…

लिखूंगा कुछ ऐसे

लिखुंगा कुछ ऐसे की दर्पण नया
लेकिन परछाई पुरानी होगी।
बदले चाहे ज़माने लेकिन
मेरी कविताओं में बस पहाड़ो की कहानी होगी।
जो बदल गए है, जो नही बदले है
कोशिश उन्हें बदलने की होगी।
पेड़ सूखकर भले ही दरख़्त हो जाय
लेकिन फिर भी पतियाँ हरी होगी।
सूरज भले ही डूब जाय
लेकिन फिर भी चाँद में चाँदनी उसीकी होगी।
खेत-खलिहानों में देख लेना
हर ओर मेहनत किसानो की होगी।
नदियों की छलारो को गौर करना
जरूरत उसे सूखी पड़ी जमीन की होगी।चीर कर देख लेना शरीर के किसी भी हिस्से को
मोहोब्बत बस पहाड़ो से होगी।
जब कभी बात होगी यादो की तो
"खुदेड़" को कगद हमेशा "खुदेड़ डाँडी काँठी" की होगी।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
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बेबसी

बेबसी इंसान की वा हालात कैर दीन्द
न त भूख लगदी न नींद।कख जी जौ, क्या जी करू, कनकै होलु
रटण बस इखरी रैंद।जैका मुख मा नज़र जांद आश वेमा ही हूंद
क्या पता वेमा ही कुई उपाय मिली जौ मन ई बुलन्द।राति का अँधेरा सीण नि दींदा
दिन का उज्याला चैन नि लीण दींदा।सिराणा बैठी की बेबसी इन चुंग्न्यान्द
सीणु त मुश्किल दगड़यों बैठ्युं भी नि राई जांद।बार-बार ऐकी इन झुरांद
गाती मा जन कुमुरु सी बिनांद।बात एक-एक सच्ची च
किलै की "खुदेड़" की अज़माई च।

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)

बुराँश

हे बुराँश आज तेरी भी कुई इज़्ज़त नि रै
राज्य पुष्प व्हेकि भी तू बज़ारो मा बिकणु छै।
जब तक तेरी कुई पूछ नि छै खुटो मुड़ मंदेणु रै
आज पछ्याण तेरी बणिगि त लोगु का घरो मा सज्यू छै।
आज गिलासु मा सज्यू छै
जू ब्याली तक डाँडीयु मा खत्यु छै।
ते थै भी मिजाण आदत व्है ग्यायि गिलास बोतलु की
तभी तू अब डाँडी काँठीयूँ नि दिखेणु छै।
        पर हे बुराँश तेरी खुद मा आज भी
               यु "खुदेड़" खुदेणु च रे!
अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)facebook.com/khudeddandikanthi

याद वा पुराणी

याद वा पुराणि
हैंसी त आंदी पर वो ख़ुशी नि मिल्दी,
जो ख़ुशी तब मिल्दी छै जो हैंसी हम थै माँ-पिताजी हैसांदा छाया। हिटदु छौ मी लमडुदू भी छौ पर,
अंगुली पकड़ी चलण सीखै जौ हाथुन आज भी वू हाथु थै थामी की जिकुड़ी हल्की व्है जांद।चीज़ त आज भी खांदा छा पर,
माँजी बाटी की दिन्दी छै वू स्वाद अब नि आन्द।
त्यौहार त अब भी घर मा मनेंदा पर,
खांदा मा की खाणा की रस्याण अब नि आंद।पाणी भी पींदा छा पर,
छोया पन्देरु का पाणी की तीस आज भी नि जांद।याद त भौत आंद पर यादो मा,
"याद पुराणी" आज भी नि जांद।जिकुड़ी आज भी खुदेड़ डाँडी काँठी की,
याद मा  खुदेणी रांद।अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)