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Van-Fool Upvan वन-फूल उपवन

वन-फूल उपवन
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वन में खिलकर जब प्रसून,
अप्रतिम छवि बन बिखरते।
धारण  कर    मधु   मकरंद,
नूतनबाला  बनकर  सजते।
            नाना रंगों से शोभित प्रकृति,
            नवल दृष्टि  मनमोहक बनते।
            मधुप  अपना   गुंजन  भरके,
            मधुमास  पथ   गमन  करते।
हवाओं  संग  मकरंद बिखेर,
उपस्थिति निज पावन करते।
सुचि  मृदु  सुगंधित वयार से,
आकर्षण   लालायित  करते।
            सजित   हरित  श्यामलता से,
            विहंगम  सौंदर्य  संचय करते।
            आसमां भी  पुलकित  होकर,
            भूरी  भूरी    प्रसन्नशा   करते।
आसमां संग  बादलों के कण,
धरती आगमन  अंगड़ाई लेते।
अपनी   मृदु    फुहार  भरकर,
चमन  में   और   उर्जा   भरते।
            हार    बनकर  वन   देवताओं,
            गौरवान्वित   सुधा  मन  भाती।
            प्रफुल्लित   समर्पण  खिलकर,
            धन्य निज जीवन पर इठलाती।

सुनील सिंधवाल "रोशन" (स्वरचित)
    काव्य संग्रह "हिमाद्रि आंचल"।

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