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Showing posts from September, 2015

वक़्त

वक़्त भी बड़ा अज़ीब होता है,
इसका मिलना कहाँ सबके नसीब होता है।
जिसे क़द्र नही वक़्त की,
उसके पास वक़्त ही वक़्त होता है।
वक़्त का एहसास जिसे होता है,
उम्रभर वक़्त के लिए वो रोता है।वक़्त कैसा भी हो अच्छा या बुरा,
समझौता इससे कर लेना ही अच्छा होता है।
वक़्त बदले या न बदले ऐ "खुदेड़" हमें बदलना ही होता है।
वक़्त भी बड़ा अज़ीब होता है,
इसका मिलना कहाँ सबके नसीब होता है।
वक़्त के आगे इंसान भी कितना मजबूर होता है,
क्योंकि वक़्त के संग न चलना ही उसका कसूर होता है।
उम्र कट जाती है वक़्त के इंतज़ार में,
वक़्त लेकिन आकर निकल भी जाता है।
वक़्त भी बड़ा अज़ीब होता है,
इसका मिलना कहाँ सबके नसीब होता है।
अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339
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आरक्षण

आरक्षण आरक्षण इस चार एक छोटे से शब्द ने देश में आज भी भेद-भाव का माहौल बनाया हुआ है, इस स्थिति पर कुछ लाइन पेश कर रहा हु आशा करता हु इस कविता को गलत दिशा की ओर नही मोड़ा जायेगा और सभी को पसंद आएगी। मैं इस कविता को किसी भी धर्म या जाति को केन्द्रित करके नहीं लिख रहा हु बस आरक्षण की निति बदलनी चाहिए इस विषय पर लिख रहा हु।



आज देश का हर नेता कहता है मैंने ये कर दिखाया वो कर दिखाया कोई इनसे पूछे क्या कोई आज तक आरक्षण ख़त्म कर पाया कहते है मैं बिजली लाया मैं पानी लाया कोई इनसे पूछे क्या गरीबो के लिए भी कोई आरक्षण है बनाया आरक्षण का ये राक्षस पूरे भारतवर्ष में है छाया है क्या ऐसा भी कोई नेता जो हटा सके देश से इस राक्षस का साया हटाये तो तब कोई जब ख़त्म होगी इनकी मोह-माया वर्ना हमें तो लगता है देश के हर नागरिक का वोट जायेगा जाया दोस्तों ये आरक्षण एक बहुत बड़ा अभिशाप है भारतभूमि पड़ चुकी इसकी गहरी छाप है कहते है सब एक सामान है लेकिन फिर भी आरक्षण की निति से एक-एक नागरिक का कर रहे अपमान है दिल किसी का मैं दुखाना नही चाहता निति-राजनीति में पड़ना नही चाहता लेकिन क्या करू मजबूर हु मैं भी जब संसद में बैठा कोई खुद को ब…

पहाड़

मैं लिखता नही कलम चल जाती है
शब्द बनाता नही अक्षर जुड़ जाते है
कोशिश करता हूँ बहुत कुछ लिखने की
ख़याल मुझे मेरे पहाड़ो की ओर ले जाते है
राह कोई भी क्यों न देखु लेकिन
रास्ते पहाड़ो में ही निकल आते है
चाह तो दिल में बहुत है लेकिन
चाहत पहाड़ो पर ख़त्म हो जाती है
सपने तो बहुत तो बहुत है आँखों में लेकिन
नींद पहाड़ो में पहुचकर खुल जाती है
प्यास तो बहुत है इस कण्ठ में
बुझती पहाड़ो से निकलती धाराओ से है अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
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आस

खुदेड़ डाँडी काँठी या
खुदेणी आज अपणो की आस मा
कख होला मेरा अपणा
कुई नि दिखेणु च पास मा
                  बांजी पुंगड़ी खौंदार कूड़ी
                   देखदा रुंदा यु पहाड़ो थै
कीला ज्यूड़ा रमदा यख गोर-बछरो की गौल्यो थै
हैल-दंदलु भी खोजदा बल्दो की कंद्यो थै
दथुड़ा-कुटला हेरदा मनख़्यो का हाथो थै
जंदुरु भी तरसदु ग्युह कोदा की दाण्यो थै डाल्यों कु छैलु भी लग्यु रैंदु बटोयु की सास मा
छोया-पंदेरा भी बिस्कणा पंदेन्यु की आस मा डाँडी काँठी भी हरचिगेनि
घस्येन्यू की याद मा
खुदेड़ डाँडी काँठी या
खुदेणी आज अपणो की आस मा अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
+91-971 695 9339
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