मथा मन सिंधु,
निकला नवनीत,
अबके बरस।
मद,लोभ,मोह संग,
सब क्रोध हिय का,
छन गये छाँछ से,
अबके बरस।
गल जाये हर भेद,
अबके बरस।
तपाग्नि तपे देह,
अबके बरस।
बड़ी थी हस्ती,
कुदरत से जिनकी,
टूटा गुमाँ सब,
अबके बरस।
झुके शीश गर्वित,
अबके बरस।
हुए चित्त शूरमा,
अबके बरस।
नाक-भौं सिकुड़े,
रहते थे जिनके।
दिखी जगह उनकी,
अबके बरस।
जीता धर्म फिर,
अबके बरस।
हारे फिर धार्मिक,
अबके बरस।
देव सब बन मनुज,
धरा पर यूँ उतरे,
जीत गयी इंसानियत,
अबके बरस।
दिखी श्रेष्ठ कुदरत,
अबके बरस।
हुआ संतुलन सा,
अबके बरस।
पायें नैराश्य में,
कुछ आस जैसा।
बने मन मन्दराचल,
अबके बरस।
उठेगा राष्ट्र फिर,
अबके बरस।
सजेगी फिर महफ़िल,
अबके बरस।
आओ मिल संभालें,
पथ और पथिक को।
तोड़ें सब जंजीरें,
अबके बरस।
नंदन राणा
1 टिप्पणियाँ
धन्यवाद भ्राता
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