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Showing posts from January, 2016

बिक गए नेता

बिक गए है उत्तराखण्ड के नेता
अब जनता को भी बेचने लगे है
पेट अभी भी इनका भरा नही
पहाड़ी पराये और विदेशी इनके सगे हैपहाड़ के हर पत्थर हर पेड़ गवाही दे रहा
इन नेताओ के हाथ हमारे खून से रंगे है
लूट सके तो लूट लेते है
नही तो फिर करवाते दंगे है कोई मरता है तो मरे
इनके कौन सा कोई अपने है
पलायन पहाड़ो से करवा दिया
अब सच कर रहे खुद के सपने हैजिनको हक़ नही इंच भर का भी
उनको एकड़ो का मालिक बनाने लगे है
हक़ था जिनका इस मिट्टी पर
उनका हक़ छीनने पर है डटेअनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339
www.khudeddandikanthi.in

मकर सक्रांति

आत्मोद्धारक व जीवन-पथ प्रकाशक पर्व – मकर संक्रांति ( १४ जनवरी )
जिस दिन भगवान सूर्यनारायण उत्तर दिशा की तरफ प्रयाण करते हैं, उस दिन नारायण (मकर संक्रांति) का पर्व मनाया जाता है | इस दिन से अंधकारमयी रात्रि कम होती जाती है और प्रकाशमय दिवस बढ़ता जाता है | उत्तरायण का वाच्यार्थ है कि सूर्य उत्तर की तरफ, लक्ष्यार्थ है आकाश के देवता की कृपा से ह्दय में भी अनासक्ति करनी है | नीचे के केन्द्रों में वासनाएँ, आकर्षण होता है व ऊपर के केन्द्रों में निष्कामता, प्रीति और आनंद होता है | संक्रांति रास्ता बदलने की सम्यक सुव्यवस्था है | इस दिन आप सोच व कर्म की दिशा बदलें | जैसी सोच होगी वैसा विचार होगा, जैसा विचार होगा वैसा कर्म होगा | हाड-मांस के शरीर को सुविधाएँ दे के विकार भोगकर सुखी होने की पाश्च्यात्य सोच है और हाड-मांस के शरीर को संयत, जितेन्द्रिय रखकर सदभाव से विकट परिस्थितियों में भी सामनेवाले का मंगल चाहते हुए उसका मंगलमय स्वभाव प्रकट करना यह भारतीय सोच है |
सम्यक क्रांति.... ऐसे तो हर महीने संक्रांति आती है लेकिन मकर संक्रांति साल में एक बार आती है | उसीका इंतजार किया था भीष्म पितामह ने | उन्…

सोच्ण पोड़द लेखण मा

सोची नि मिल कबि बोल्ण मा
पर हर बात सोच्ण पोड़दी लेखण मा
अच्काल लोग व्यस्त रैंदी आखर चखण मा
यू क्या पता कख कख गै होलु लेख्वार सोचण मा देश पहाड़ घार बौण सब याद ऐ जांद
आखरों थै ऐथर पैथर कचमोड़णण मा
वक़्त सर्या दिनमान भरा कु लग जांद
रीटि की फिर उई लैन फर फरकण मा स्यूंण धागा कतगै टुटी जंदी
आखर से आखर गठ्याण मा
कलम कतगा घिसे जंदी
पंक्तियों थै सजाण मा सालो साल बीत जन्दी
यू आखरों रोपण मा
पंदेरो कु पाणी सूखी जांद
आखरों मौलाण मा लिखणा कु ज्यूँ त भौत करदु
पर आखरों की कमी च "खुदेड़" ये प्राण मा
खुज्यांद खुज्यांद दूर भिंड्या चली जांदू
आखरों थै खुज्याण मा लिख्यु जनु भी होलु पर सेली पोड़ी जांद
आखरों कैका जिकुड़ा पुटुग कुच्याण मा
पसंद आयी हो "खुदेड़" की कल्पना त
वक़्त नि लगलु ऐथर सरकाण मा। @नोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339



वी मेरु गाँव छा

नमस्कार दोस्तों आज एक गीत आप लोगो के बीच सुरो के धनी लोक गायक भाई सुरेन्द्र सेमवाल जी का एल्बम बिन्दुमति से जो SDE प्रोडक्शन से है बहुत ही खूबसूरत तरीके से उत्तराखण्ड का विवरण दिया और संस्कृति को प्रकृति अपने इस गीत में दर्शाया है दोस्तों इस गीत को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे।
एल्बम बिन्दुमति
गायक सुरेन्द्र सेमवाल
निर्माता दौलत राणाबारा मैनो दीवाली जख बिरणो मा भी प्यार जख
सुर सुर्या बथौ सुर सुर्या बथौ
ऐजा हे देशवल्या बाँद वी छा मेरु गौ
ऐजा ये सलण्या बाँद वी छा मेरु गौ
फूल खिलखिलांदा जख चखुला बासी जांदा जख
पहाड़ गढ़-कुमौ   पहाड़ गढ़-कुमौ
ऐजा ये देशवल्या बाँद वी छा मेरु गौ
ऐजा ये सलण्या बाँद वी छा मेरु गौसाथी- ऐजा हे देशवल्या बाँद वी छा मेरु गौ
          ऐजा ये सलण्या बाँद वी छा मेरु गौमनखी जख देवतो मा देवता भगवान छा
साथी- देवता भगवान छा देवता भगवान छा
पतिव्रता नारी छा पंच-पण्डो महान छा
साथी- पंच-पण्डो महान छा पंच-पण्डो महान छा
थौला म्यालो मा कनु भलु समो
थौला म्यालो मा कनु भलु समौसाथी- ऐजा ये देशवल्या बाँद वी छा मेरु गौ
          ऐजा ये सलण्या बाँद वी छा मेरु गौबथौ जख धार मा नारी सज…

खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली

तुमरी तौ खुट्यों मा जब लगला पराज
अर आँखि यखुली मा रगरे जाली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।लगालु बथौ, ऐकी गीत चौक तिबरी मा
अर बुग्यालों की पिड़ा खुट्यों कुतग्यलि लगाली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।गाड-गदेरा जब धै लगै की भट्याणा राला
अर हैरी डाली बोटी तुम थै सनकाणी राली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।डोखरी-पुंगड़ियों मा जब लागलु घाम तैलु
या दूर डाँडियुं कुई घस्येरी खुदेणी राली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।होलु कुई जब डाला छैल अधुरवै कैकि
या कै बुलाणा खु चुल्लो की आग भभराली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।बडुलि बणी की जु खुद लगलि गौला मा
या सुपिन्यों मा सनकाली कुई आँखि रत्नयालि
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।बस्ग्याल सी बरखलि कबि जु आँखि दगड्यों
या जिकुड़ि, सौंजङ्यां कुई धीर धराली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।सारी जब हैरी पिंगली रंगो मा रंगी होली
अर समलौंण कैकि कुई घार बिटि आली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।भितर कखि कुई जब कुई दानु खासलु
अर खबरसार जब कैमा घार-गौ की सुण्यालि
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।बरखा कु लग्यु रालु झमणाट
अर डाँडियूं जब कुयेड़ि घनघोर लागली
खुदेड़ डाँडी काँठी याद आली।
@नोप सिंह नेगी(खुदेड़)
971 6959 339

ज्यूँ मेरु भी बोल्दु

ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
सदानि खुण अपणा पहाड़ो मा लौटी जौ,
पर अफ़सोस अब मि परदेशी व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
गौ मा अपणा रली मिसी जौ,
पर अफ़सोस अब मि शहरी व्हेग्युज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
दगड्यों दगड़ वे माटु मा रब्दोंलण्यो रौ,
पर अफ़सोस अब मि चमकदार व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
बण मा जैकी ढेबरा बखरो चरौ,
पर अफ़सोस अब मि कुकर चराण लैग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
गागर, बंठो, पंदेरो कु पाणी प्यू,
पर अफ़सोस अब मि R O बिसलेरी वलु व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
झुंगरु-फाणु अर रोटी कोदा की खौ,
पर अफ़सोस अब मि बर्गर पिज़्ज़ा वलु व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
त्यूंखा, फतै कुर्ता गात लगौ,
पर अफ़सोस अब मि पैंट कोट वलु व्हेगु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
नौनु थै अपणा दादा-ददि की खुचलि मा खिलौउ,
पर अफ़सोस अब मि मेड वलु व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
ब्यो-बरातो मा ढोल-दमाऊ मा रासू खूब लगौ,
पर अफ़सोस अब मि डीजे वलु व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
भाषा गढ़वली, कुमाऊनी, जौनसारी बच्यऊ,
पर अफ़सोस अब मि अंग्रेजी वलु व्हेग्यु।ज्यूँ मेरु भी बोल्दु,
द्वी घड़ी डाला छैल म बैठी शुद्ध हवा खौ
पर अफ़सोस अब मि कूलर A C वलु व्हेग्यु।ज्यूँ मे…