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Barnyard millet jhangora झुंगरु झंगोरा

झंगोरा/ झुंगरु

नमस्कार मित्रो आज एक बार फिर लेकर आया हूं आपके बीच एक और फसल को लेकर फसल ऐसी जो असिंचित भूमि पर बहुत ही आसानी से हो जाती है। पोएसी कुल का यह पौधा है और पौषिटकता व औषधीय गुणों से भरपूर है।
मित्रो आज हम बात करने वाले है झंगोरा/ झुंगरु/ समा के चावल के बारे में इसे अलग अलग स्थानों पर अलग अलग नामो से जाना जाता है।
समा के चावल को वरई, कोदरी, समवत, सामक चावल के नाम से जाना जाता है। गुजराती में इसे मोरियो और सामो कहते है अंग्रेजी में इसे Barnyard millet कहते हैं। भगर और वरी (वरी चा तांदुळ) नाम से इसे महाराष्ट्र में जाना जाता है। हिन्दी में इसे मोरधन या समा के चावल कहा जाता है, बंगाल में इसे श्याम या श्यामा चावल के नाम से जाना जाता हैं। इसका महत्व क्या हो सकता है इसके इस नाम से भी आप समझ सकते है, बिलियन डॉलर ग्रास।
यह भी रागी और कौणी की ही तरह ही किसी भी जलवायु में पैदा हो जाता है यही कारण है कि देशभर में लगभग सभी जगह उपलब्ध होता है।
झंगोरा का वर्णन वेदों में भी किया गया है, इसका उपयोग हिन्दू धर्म मे व्रत में सेवन किया जाता है। वेदों में भी झुंगरु का वर्णन है तो इससे आप समझ सकते है कि झंगोरा धरती पर कितनी पुरानी फसल है।

झुंगरु का उपयोग उत्तराखण्ड में तो मात्र चावल की तरह पकाकर खाया जाता है या छंच्या के रूप में खाया जाता है किन्तु भारत मे इसका और तरह से भी खाने के उपयोग में लिया जाता है जैसे
समा के चावल की खीर, पूरी, साबुदाना व समा का चीला, कचोरी, चकली, पुलाव, खिचड़ी, इडली, डोसा ढोकला आदि।
झंगोरा उत्तराखण्ड के अलावा भारत के लगभग सभी प्रदेशो में हो जाता है, और भारत ही नही बल्कि ये नेपाल, चीन, जापान, पाकिस्तान, अफ्रीका आदि में भी उगाया जाता है। यदि हम बात करे झंगोरा की प्रजाति की तो इसकी लगभग 32 प्रजातियां है, लगभग अधिकतर जंगली प्रजाति ही है, लेकिन E. utilis और E. Frumentacea ही मुख्य रूप से उगाई जाती है। E. Frumentacea जो कि भारत और मध्य अफ्रीका में उगाई जाती है और E. Utilis कोरिया, जापान, चीन में उगाई जाती है।
झंगोरा की खेती जो अन्य fillet की तुलना में कम मेहनत और जल्दी तैयार होने वाली एक फसल है।
अब बात करते है इसमें मौजूद औषधीय गुणों और पौष्टिकता के बारे में। झंगोरे में कार्बोहाइड्रेट 65.5gm/100 ग्राम चावल से कम होता है और धीमी गति से पाचन होता है जिस वजह से इसे शूगर के उपचार में बेहतर बताया जाता है। झंगोरा में Low कार्बोहाइड्रेट digestibility और High dietary fiber होता है जो शरीर मे ग्लूकोज लेवल को नियंत्रित रखता है। यह Celiac रोगियों के लिए यह एक बेहतर विकल्प होता है क्योंकि यह gluten free होता है।
Celiac रोग के लक्षण जो इस प्रकार है।
अपच
मंद पेटदर्द
पेट फूलना
आंत की प्रवृत्ति में बदलाव होना, मंद अतिसार या कब्ज के प्रकरण।
आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया
भूख ना लगना
वजन में गिरावट
आपके हाथों और पैरों में झुनझुनी और सनसनाहट (पेरिफेरल न्यूरोपेथी)
उल्टी (आमतौर पर केवल बच्चों को प्रभावित करती है)।
बाल झड़ना (एलोपीशिया)
मुँह में छाले
मासिक चक्र चूकना
त्वचा पर तीव्र निशान
हड्डियों और माँसपेशियों की समस्या (माँसपेशियों में ऐंठन, जोड़ों और हड्डियों में दर्द)।
आप यदि amazon पर या अन्य ऑनलाइन वेबसाइट पाए देखेंगे तो इनपर झंगोरा से बने कई खाद्य पदार्थ आपको मिल जाएंगे और इनकी कीमत लगभग 100 रुपये से शुरू होती है और 300 तक होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसकी व्यसायिक खेती कितनी फायदेमंद सिद्ध हो सकती है।
इससे बने पदार्थ जो मैंने कुछ बताये है और कुछ यहाँ इस प्रकार है एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग कॉलेज रिसर्च इंस्टीट्यूट, पोस्ट हार्वेस्ट टेक्नोलॉजी, सेंटर तमिलनाड़ू एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी द्वारा निर्मित
पापड़, यानो बढ़ाई, मुरुरकू, पनियारम, रिवन पकोड, स्वीट कंसारी, अधिश्रम, खखरा, उपमा, इडियापम, पूहो, खरी, हाट कोलकटाई, मिठाई इसी तरह के और भी कई तरह के उत्पाद इससे तैयार किये जाते है।
इन निर्मित पदार्थो का यहा के लोकल मार्किट में खूब मांग है।
Millet अनाज पौष्टिक गुणों से भरपूर तो होता ही है साथ ही gluten free food और slow digestible होते है, जो सेहत के लिये लाभदायक होते है यदि इनकी खेती व्यवसायिक रूप से की जाए तो बेहतर रिजल्ट देखने को मिलेंगे।
झंगोरे में प्रोटीन  6.2 ग्राम, वसा 2.2 ग्राम, फाइबर  9.8 ग्राम, कैल्शियम  20 ग्राम, फास्फोरस  280 मिलीग्राम, आयरन 5.0 मिलीग्राम, जिंक  3 मिलीग्राम, मैग्नीशियम  82 मिलीग्राम, पाया जाता है। इसमें प्रोटीन 12% जो कि 81.13%, 58.56% है और कार्बोहाइड्रेट 58.56% जो कि 25.88% slow digestible होता है।
यदि सभी millet की बात करे तो सबसे अधिक millet उत्पादन अकेला फ्रांस करता है जो कि 3.3 टन प्रति हेक्टेयर millet उत्पादन करता है। आज से 17 वर्ष पहले जब उत्तराखण्ड राज्य बने मात्र एक वर्ष भी नही हुआ होगा उस वक़्त तक ही झंगोरा के उत्पादन क्षेत्र में 72% कई कमी आंकी गयी थी(2001 के एक अध्ययन के अनुसार)। अब आप अंदाजा लगा सकते है कि इसकी आज के समय मे क्या स्थिति होगी।

कुछ पुराने वानस्पतिक लेख

भीमल                      बुराँश शर्बत             कंडली
कुणजु/ नागदाना        लिंगुड़ा                   हिंसर
किलमोड़ा                  घिंगरु                    टिमरू भमोरा                      डैकण/डकैन          कौणी    तिमला                      मालू                    रागी/मंडुआ

मिष्ठान
बाल मिठाई

अनोप सिंह नेगी(खुदेड़)
9716959339

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