जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी,
जो ना समझ सका अब तक,
वह तो स्वप्न में मुझे दिखाना चाहती थी।

ना राह मालूम थी, न मंजिल का ही पता था,
निकल पड़ा था ना जाने क्यों, मैं उस राह पर,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

राह भी कुछ अजीब थी,
मैं मंजिल से दूर, लेकिन वह मेरे करीब थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

राह में पथिक मिले, जो दूर तक संग चले,
फिर आगे राह मेरी अकेली थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

कुछ ऐसे मिले जिनपर भरोसा करना मुश्किल था,
भरोसा कर लिया, नही करना था,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

फिर से उन्हें छोड़ आगे बढ़ा राह भटका,
दूर एक लौ जलती दीख पड़ रही थी,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।

मंज़िल नज़दीक, राह कठिन और,
अंजानो के बीच सफर अकेले तय करना था,
शायद जिंदगी मुझे कुछ समझाना चाहती थी।


कर भरोसा तू सब पर मगर एक दायरे में,
आत्मविश्वास बनाये रख, धोखे भी है सफ़र में,
शायद यही जिंदगी मुझे समझाना चाहती थी।

अनोप सिंह नेगी (खुदेड़)
9716959339