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Showing posts from July, 2017

Pattharo Se Bhi Nikalte Geet पत्थरों से भी निकलते गीत

पत्थरों से भी निकलते गीत


हौसला गाने का होता है तभी ,
    पत्थरों से भी निकलते गीत हैं |

जो समझलैं ये भी दिए भगवान ने
शूल से भी तो निकलती प्रीत है ||

नित चलाये जिसने तीखे वाण ही ,
उर समझता ही रहे वो मीत है ||

हो अँधेरी रात छाये मौन भी ,
पर समझलो है दिवाली,ईद है ||

वो हार को भी हरा सकते हैं जो ,
हौसला करते रहैं कि जीत है ||

ना दुखी करना हृदय को कष्ट में ,
कष्ट देना तो जगत की रीत है ||

हौसला गाने का होता है तभी ,
पत्थरों से भी निकलते गीत हैं ||



©डाoविद्यासागर कापड़ी

Chalo Gaaon Ghoom AAte Hai चलो गाँव होके आते हैं

चलो गाँव होके आते हैं


बुजुर्गों की खाली खोली में कुछ रात सोके आते हैं  ,
चलो रे चलो बच्चो अपने गाँव होके आते हैं ||

बंजर पड़े सारे खेतों को अपने पसीने से सींचकर,
मडुवा,झिंगोरा,गहत,भट्ट मिलकर बोके आते हैं |

चलो रे चलो बच्चो अपने गाँव होके आते हैं ||

रोपेंगे नीबू,सेव,आड़ू और अखरोटों के पेड़ भी,
चलो साग सब्जियों के लिए कुछ खाद ढोके आते हैं |

चलो रे चलो बच्चो अपने गाँव होके आते हैं ||

परिस्थितियों वस छूटा है वो प्यारा सा पहाड़ जो ,
चलो गले उसके लिपटकर थोड़ा रोके आते हैं |

चलो रे चलो बच्चो अपने गाँव होके आते हैं ||

बुजुर्गों की खाली खोली में कुछ रात सोके आते हैं ,
चलो रे चलो बच्चो अपने गाँव होके आते हैं ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

Geet He Veenapati गीत हे वीणापति

गीत  हे वीणापति

हे वीणापति,क्या करूँ अर्पन तुम्हें माँ |
उर के गीतों का ही नित वंदन तुम्हें माँ ||
हे वीणापति,क्या करूँ अर्पन तुम्हें माँ ||

माँ तुम बसी हो लेखनी में जानता हूँ |
 सिर पर तेरा नित हाथ होगा मानता हूँ ||

करूँ भोर में स्मरण का चन्दन तुम्हें माँ |
हे वीणापति,क्या करूँ अर्पन तुम्हें माँ ||

माँ नित हरोगी ताप और संताप तुम ही |
मेरी कविता की भी बनोगी छाप तुम ही ||

अर्पित मेरे काव्य का सृजन तुम्हें माँ |
हे वीणापति,क्या करूँ अर्पन तुम्हें माँ ||

पग कुपथ से मोड़ देना यही विनय   है |
प्रवाहमय हो काव्य धार यही विजय है ||

अर्पित है हर मौन और गुंजन तुम्हें माँ |
हे वीणापति,क्या करूँ अर्पन तुम्हें माँ ||

उर के गीतों से ही नित वंदन तुम्हें माँ |
हे वीणापति,क्या करूँ अर्पन तुम्हें माँ ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी
           27-6-2017

Madhushala 2 मधुशाला 2

मधुशाला

अरि के उर हो प्रतिशोध की,
         धधक रही बड़ी ज्वाला |
उसको नीर बना सकती है,
        वाणी की ही मधुशाला ||


यदि कोई रखता हो उर में,
       गरल मिली थोड़ी हाला |
मैं उसके हित रखूँ प्रीत की,
       पूरी-पूरी मधुशाला ||

प्रीत की हर बूँद बनाती,
      छलकाती सुख की हाला |
अरिता की तनिक घूँट से,
      बनती दु:ख की मधुशाला ||

रिपुता ने तो नष्ट किया है,
         करुणा ने भू को पाला |
इसी लिए मुझको भाती है,
        दया,प्रीति की मधुशाला ||

सुरभित मित्रता का पी लो  ,
          भर-भर बाँट कर प्याला |
नश्वर तन है धरी रहेगी,
         कटुता की ये मधुशाला ||


     ©डाoविद्यासागर कापड़ी

Path Ke Patthar पथ के पाथर

पथ के पाथर

पथ का पाथर कहाँ किसे कब  ,
        कहो तनिक छल पाता है |
ठोकर देता तभी पराया,
           मीत पता चल पाता है ||

यदि राह पर सुमन केवल हों  ,
       सुख का भी आभास न हो |
यदि बाधा ना बाँह पसारे  ,
         उर में कोई आस न हो  ||

पथ के रोड़े दर्शाते हैं  ,
      अरि की जो मुस्कान कुटिल |
कहते मोड़ राह को अपनी,
       पानी है तुझको मंजिल  ||

आनंदों की शुभ अनुभूति भी,
         शूल नहीं तो कब होती |
गन्तव्यों की खुशी राह पर,
        रोड़े हों तो तब होती ||



    ©डाoविद्यासागर कापड़ी

Madhushala By Vidhyasagar Kapri मधुशाला विद्यासागर कापड़ी

मधुशाला

दीप जलाकर नव मयूख से,
         खोल दिया उर का ताला |
नवल दिवस में भेज रहा हूँ  ,
         शुभ स्मृति की मधुशाला ||


हृदय में नव आनन्दों का,
        छलके परिमल का प्याला  |
और बुलाये हर्षित होकर  ,
         मुस्कानों की मधुशाला ||

प्रीत नवेली,मित्रों से नित,
           आये ले सुख की माला |
और लेखनी गीत सुनाये,
           पा काव्य की मधुशाला  ||


बैरी भी कटु भाष बोलकर,
           दे न सकें उर में छाला |
अधरों में नित मन्दहास हो  ,
         खुले प्रीत की मधुशाला  ||


पथ पर बढ़ते कदम रहें नित  ,
         रोके ना अरि का जाला |
स्वयं दौड़कर गले लगाये,
        गन्तव्यों की मधुशाला  ||



©डाoविद्यासागर कापड़ी
          25-6-2017

Mere Dohe 2 मेरे दोहे २

मेरे दोहे २



1-कौन देखता घन यहाँ ,कौन झूलता डाल |
   धन की गठरी बाँधते ,बुनते सब जंजाल ||

2-घन ही तो करते यहाँ ,धरणी का श्रिंगार |
  मुस्काते हैं खेत सब ,हँसती वट की डार ||

3-घन की चादर ओढ़कर ,मनहर लगता व्योम |
वसुधा हित वो मुदित हो ,बरसाता है सोम ||

4-सावन भादो मास में ,घन का नर्तन देख |
   कवि गढ़ते कविता नई ,लेखक लिखते लेख ||

5-पयस्विनी भरकर चली ,तन बल का भण्डार |
  अपनी बाँह पसारती ,मचता हाहाकार ||

©डाoविद्यासागर कापड़ी

Doobe Unke Pyar Me डूबे उन के प्यार में

इस कदर डूबे उन के प्यार में जैसा पानी में पानी।
दिल के जज्बात घल गए लब्जों में जैसे कवि में कहानी।
अब खुद को तलासते है उन की आँखों में।
जैसे मरुस्थल की रेत में मिलता हो पानी।

आदमी

Harela हरेला

हरेला

आ रहा है फिर हरेला,रोप लेना पेड़ को |
रुके न साँसों का मेला, रोप लेना पेड़ को ||

हरित वन ही दे सकेंगे,इस धरा को वात जल,
काट कर तुम वन विटप को,कर गए निज से ही छल |

आ न जाए मृत्यु बेला,रोप लेना पेड़ को |
आ रहा है फिर हरेला ,रोप लेना पेड़ को ||

साँस में बाधा न होगी,व बुझेगी प्यास भी,
टूटती सी फिर जुड़ेगी,इस धरा की आस भी |

अनाज का होगा रेला,रोप लेना पेड़ को |
आ रहा है फिर हरेला,रोप लेना पेड़ को ||


©डाo विद्यासागर कापडी

Geet Prem Ke Gate Hai गीत प्रेम के गाते हैं

गीत  प्रेम  के  गाते  हैं


तम को हरने आओ मिलकर,
       छोटा दीप जलाते हैं |
उर की कटुता का भंजन कर,
         गीत प्रेम के गाते हैं  ||

            हम गीत प्रेम के गाते हैं ||

यह तन तो माटी का पगले ,
      माटी में मिल जायेगा |
आज सिला है सूट सलोना,
        कभी कफन सिल जायेगा ||

चलो सभी को मीत बनाकर,
       सबके उर बस जाते हैं |
उर की कटुता का भंजन कर,
         गीत प्रेम के गाते हैं ||

          हम गीत प्रेम के गाते हैं ||

किसी और की कभी हार में,
       अपनी जीत न खोजो तुम |
उर जीता यदि किसी और का,
         विजय हुई यह सोचो तुम ||

यही वेद में सार छिपा है,
      यह पथ ही अपनाते हैं |
उर की कटुता का भंजन कर,
      गीत प्रेम के गाते हैं ||

          हम गीत प्रेम के गाते हैं ||

बोल सको तो मधुर बोल दो,
        स्नेह कलमी हो सकता |
रसना से निकले शब्दों से,
       हृदय छलनी हो सकता ||

मधुर भाष की खाँड घोलकर,
          आओ प्रीत सजाते हैं |
उर की कटुता का भंजन कर,
         गीत प्रेम के गाते हैं ||

            हम गीत प्रेम के गाते हैं ||

शूल चुभा जो पथ में चलते,
          किसी और के पाँवों में |

Mere Dohe मेरे दोहे

मेरे दोहे.

1-बनी रहे नित आपके ,अधरों पर मुस्कान |
   नित रसना करती रहे,केशव का गुणगान ||

2-ऐक दिया भी तम गहन ,देता है नित चीर |
  ऐक मनुज यदि ठान ले ,खींचे नई लकीर ||

3-खाली धरती ना रहे ,लगे वटों की माल |
  धारे हों जीवित सभी ,भर जायें सब खाल ||

4-कब तक बाधायें कहो ,रोकेंगी पदचाल |
   मन में धीरज राखिये ,मुड़ जायेंगे व्याल ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

Bhanwro Ki Barat भवरों की बारात.

तुझे खुसबू की सौगात दूँ या
भवरों की बारात...?

तुझे दे दूँ फूलों की सौगात मै
तो सबनम हो तेरी मौहताज..

दिन महकें गुलों से तेरा और
खिले चाँदनी तेरी चौखट पर हर रात

आदमी

Mujhe Shunya Bana De

मुझे शून्य बना दे
 खुदा
मेरी कीमत बनी रहे सदा
आगे लगूँ न कीमत
घटाने के लिए
पीछे खडा रहूँ कीमत
बढाने के लिए
मुझे शून्य सा मिला दे
खुदा
मेरा मैं शून्य सा रहे
सदा


देवेश आदमी

Likh Rahi hoon Sapnaलिख रही हूँ सपना

लिख रही हुँ एक सपना एक हकीकत
ऐ जिन्द्गी तेरे लिए कलम की वसीयत
रामेश्वरी नादान

Paharo ki yaad पहाडों की याद

हमने पहाडों की याद में यूँ ज़िन्दगी पार की,
करवटैं बदल-बदल कर रातैं गुजार दी ||

ये पहाड़ चीख-चीख कर पुकारे यारो,
अब इन बीरान पहाडों को कौन सँवारे यारो ||

तेरे जाने से यहाँ की बयार छली गई,
पहाडों की फिजाँ व रौनकैं चली गई ||

दिखता होगा वहाँ भी यकीनन चाँद तो,
आती होगी तुम्हें भी पहाडों की याद तो |

रहते होगे फ्लैट में कूलरों की वात में,
पर सुनाई देती होगी तुम्हें पहाडों की धात तो |

खुश रहो तुम ये देता दुआ पहाड़ है,
लाना एक बार भगवती की छात तो |

बचे कुछ बुजुर्ग हैं अब भी तो गाँव में,
आकर कर लेना उनसे खुशी से बात तो |

दिखता होगा वहाँ भी यकीनन चाँद तो,
आती होगी तुम्हें भी पहाडों की याद तो ||

सर्वाधिकार सुरक्षित डाoविद्यासागर कापड़ी

Geet Hindi 1

गीत


था हृदय में दम्भ मेरे भर गया,
और मैं विजय की कामना करता रहा |

परिमल से भरे सुमनों की चाह में,
शूलों से ही मैं सामना करता रहा ||

दुत्कार कर द्वार आये भिक्षु को,
देवों की ही मैं अर्चना करता रहा |

था हृदय में दम्भ मेरे भर गया,
और मैं विजय की कामना करता रहा ||

माँ ने दी थी कोख उसको भूलकर,
मैं वामा की ही वन्दना करता रहा|

था हृदय में दम्भ मेरे भर गया,
और मैं विजय की कामना करता रहा ||

अपने उर की धूल को ही ढाँककर,
मैं अपने से ही वञ्चना करता रहा |

था हृदय में दम्भ मेरे भर गया,
और मैं विजय की कामना करता रहा ||



          ©डाoविद्यासागर कापड़ी

Tera Hona Bhi Vaise Hi Hai तेरा होना भी वैसे ही है जैसे

तेरा होना भी वैसे ही है जैसे

धूप में बारिश का आना
सर्दी में ठण्डे पानी से नहाना
हर गलती पर करना बहाना
पापा का बच्चों को लौरी सुनना
माँ का अचानक बच्चों से दूर होना
सर्दी के दिनों में सुबह जल्दी जगाना
बर्षात में बिन मांगे पानी पिलाना
बिन बात के गले लग के पलके भिगाना
टुटी हुई डाली पर बच्चों को झुकाना
रात के अंधेरा में चौराहें पर बुलाना

तेरा होना भी वैसा है जैसे तेरा न होना

देवेश आदमी
मैं कवी हूँ
कि कवि हूँ
कभी हूँ
कि नहीं हूँ
घस्यारा है
या कलमकार
किसको चाहिए
जय -जयकार !
बदलोगे समाज को?
या पहनोगे हार !
ढोल -नगाड़े बजा रहे हो
लिखना कब सीखोगे यार ?


सर्वाधिकार सुरक्षित  राजेन्द्र सिंह रावत©

Mere Dohe part 1 मेरे दोहे भाग १

मेरे  दोहे


1-मक्खी ढूँढे गन्दगी,अलि ढूँढे मधुपान |
   ढूँढे से दोनों मिलें,अपना-अपना ग्यान ||

2-ब्रह्म घड़ी में जो उठे,वो पाये आनन्द |
  सागर ऊषा में खुलैं,हरि द्वार जो बन्द ||  

3-माँ की हर आशीष में,कोटि यग्य का सार |
   सागर की हर पीड़ तो, आशीषों से क्षार ||

4-सदा साथ रख लीजिए,मातु चरण की धूल |
    सागर पथ के शूल भी,बन जायेंगे फूल ||

5-माँ को दु:ख ना दीजिए,आता है संताप |
  सागर माँ हँसती रहे,कट जाते सब पाप ||

6-बिन अँधियारा होकहाँ,उजियारे का भान |
  सागर तम बिन ही मिला,किसे विजय का गान ||

7-फिर-फिर फिरता जगत में,मन तू सदा निपंग |
  सागर नाम जपा नहीं,किया नहीं सत्संग ||


   ©डाoविद्यासागर कापड़ी

Ishq ke Adib इश्क़ के अदीब

वो चल रहे थे  इस कदर  गजब नज़ारे ढा गये।
दुनिया ने चलना छोड़ दिया,मुर्दो पे प्राण आ गये।।तेरे  इन शब्द भेदी बाणों से। दिल घायल हो गया मेरा।
तरकस में मेरे तीर नहीं । मैं कायल हो गया तेरा ।इश्क़ के अदीब बैठै है  रुखसाई के चोराहे पर ।
अफ़सुर्दा है मन मेरा  इश्क़ का इंजाम क्या होगा ।।

सर्वाधिकार सुरक्षित दिवाकर बुड़ाकोटि

Meru Supnyo ku Uttarakhand मेरु कु सुपन्यों उत्तराखण्ड

।।मेरु कु सुपन्यों उत्तराखण्ड।।

हिमामै  की  कोळी  म पसिरियों
मेरु   सुपिन्यों    कु  उत्तराखण्ड
हिमालै   की  लोळी  म  चमकुणु
मेरु   सुपिन्यों  कु  उत्तराखण्ड।

बुग्याळों  म   गिरमुण्डी  खेळूणु
मेरु   सुपिन्यों   कु  उत्तराखण्ड
मठ - मन्दिरों   म घण्टी  बजोणु
मेरु  सुपिन्यों   कु  उत्तराखण्ड।

फूलों    की  घाटियों  म   हैंसुणु
मेरु   सुपिन्यों   कु  उत्तराखण्ड
टेडी  मेडी  बाटियों  म  दनकुणु
मेरु  सुपिन्यों कु   उत्तराखण्ड।

गंगा की  छलार  म उलारियोणु
मेरु   सुपिन्यों   कु उत्तराखण्ड
गौं मुल्क क बार-तिवार  मनोणु
मेरु  सुपिन्यों  कु  उत्तराखण्ड।

बांसुरी  की    भौण  म   खुदेणु
मेरु   सुपिन्यों  कु  उत्तराखण्ड
बुरांशी    क    बौण  म खिलणु
मेरु  सुपिन्यों कु  उत्तराखण्ड।

मिरगों  क   झुण्ड   म   नाचुणू
मेरु  सुपिन्यों  कु  उत्तराखण्ड
देवतों   क   कुण्ड    म   नहेणु
मेरु  सुपिन्यों कु उ त्तराखण्ड।

डाळियों की फांग्यों म बैठियों
मेरु  सुपिन्यों  कु  उत्तराखण्ड
बीटों  की  पाखियों म लटक्यों
मेरु  सुपिन्यों कु उत्तराखण्ड।

भला दिनों जग्वाल म  खोईयों
मेरु  सुपिन्यों कु  उत्तराखण्ड
सुपन्यों की दुन्या म …

Hudu Ne Muflisi Me Dabish Di हुदू ने मुफ़्लिसी में दबिश

हुदू ने मुफ़्लिसी में दबिश दी मेरे बज़्म में
गुलिशतां था जो दरख्तों की तरह दिखने लगा
आज भी मेरा चमन हया में है मगर मदफूंन हूँ महजूज हूँ
सुकून है जन्नत नही नसीब में पर मसरूर हूँ मसगूल हूँ

आदमी

Ga Le Mann गा ले मन

गा ले मन

  गा ले मन कंटक पथ में भी |

    मिले सुख या व्यथा घनेरी ,
    मिले निशा या भोर सुनहरी |
    कभी शूल या कभी सुमन हों ,
    मुक्त रहो तुम या बन्धन हो ||

   मुदित रहो नित कर्मपथों पर ,
   चढ़ ही लोगे तुम रथ में भी |
    गा ले मन कंटक पथ में भी ||


   माना सबने सायक ताने ,
   या अपने भी थे अन्जाने |
   पर तूँने सब हैं पहिचाने ,
   कुछ खोकर भी जा ले पाने ||


   कभी मिलेगा दु:ख का तल तो,
   कभी चढ़ेगा सुख छत में भी |
   गा ले मन कंटक पथ में भी ||


    जगती की है रीत पुरानी ,
    राह दिखाता है अन्जानी |
    फिर गढ़ता है एक कहानी,
    नयनों को देता है पानी ||

   यहाँ संभल भरोसा करना ,
   होता असत  नित शपथ में भी |
   गा ले मन कंटक पथ में भी ||

  गा ले मन कंटक पथ में भी ||

    ©डाoविद्यासागर कापड़ी

Kaisi Yah Bhartiyata कैसी यह भारतीयता

कैसी यह भारतीयता

कैसी यह भारतीयता
कैसा लोकतंत्र
शोषित है लाचार यहां
शोषक विचरता स्वतंत्र

पंख लगा उड़ गए
मंथन और विचार
चारों और फैला ,आडम्बर और व्याभिचार

धूमिल होती छवि देश की
धुमिल गरिमा-गान
राष्ट्रचिंतक सो गए
लम्बी चादर तान


खद्दर खादी बिक गए
बिक गया ईमान
शासन और प्रशासन में
बैठें है चोर और बेईमान

कुर्सी आज अराध्य सभी की
अवतार बना है पैंसा
नौटंकी सब दिखला रहे
नेता हो या अभिनेता

कहे कवि -राजेन्द्र कुछ ऐसा
करनी जिसकी ,जैसी होगी
वो भरेगा वैसा .


सर्वाधिकार सुरक्षित राजेन्द्र सिंह रावत©

Hotel Naukri होटले नौकरी

होटले नौकरी

भांडों    का   ढाँगो   मा   ढक्याँ  छां    माँ   जी
तन्दूरै   की    हाळी    मा   पक्यां    छां  माँ जी
छ्न्दा    रौंत्याळा     मुल्क    छोड़ी   रात-दिन
हम   होटलों  की खस्यों मा लुक्यां छां माँ जी।

बावन    भाँति  का  ब्यंजन  बणियाँ छाँ माँ जी
चाखी   तक नी सकदा कैमरा लग्यां छां माँ जी
छन्दा  दैह दूद कोदू कंडाळी छोड़ी सुबेर बिठि
औरों  सणि खेलेकि अफु भुख्यां ही छाँ माँ जी।

गर्मी   इतगा  नंगा  फर्श  मा  सियाँ छां माँ जी
मच्छरोंन  खेकी हाथ ख्वटा उगायां छां माँ जी
छंदी शांत  शीतल  रात  छोड़ि  हम  निरभागी
दिन दोफरा रोळा धौळा  मा  स्यां  छां माँ जी।

आज क्वी  बल  बड़ा साहब आयन छां  माँ जी
बल्दों जोड़ी सी सुबेर बिठि जोतियां छां माँ जी
छंदी मनखी  ज्वेनि छोड़ी  अजक्याळ रात भर
भेरू भूत पिचाक्स  सी हम  बिज्याँ छां माँ जी।

हम  भोळ  सुबेर   घोर  पेटियाँ   छाँ   माँ    जी
गढ़वाळ एक्सप्रेस का टिकट लिन्यां छां माँ जी
छंदा   मुल्क    जौंला   रौंला  हम  आज   बिठि
अपणा   मन  मा  सौं सुगन्ध खायाँ छां माँ जी।

                          कवि-विक्रम शाह (विक्की)

Ae Mere Ghanshyam ए मेरे घनश्याम

ए  मेरे घनश्याम


1-ठोकर देता जब कभी ,तुरत पकड़ता हाथ |
  तव लीला किसको पता ,हे जग दीनानाथ ||

2-उषा तुझसे ही बने ,और सुहानी शाम |
  तुझसे ही ऋतुयें बनें ,ए मेरे घनश्याम ||

3-हृदय से है बन्दगी ,हृदय से प्रणाम |
  और क्या अर्पण करूँ ,ए मेरे घनश्याम ||

4-माल सांसों की तेरी ,धड़कन तेरे नाम |
  डोर थाम ले चल जहाँ ,ए मेरे घनश्याम ||

5-सुख तू ही देता हमैं ,दुख भी तेरे  नाम |
   फूल-शूल तेरे सभी ,ए मेरे घनश्याम ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

Harela Lok Parv Ki Badhai हरेला लोक पर्व की बधाई

हरेला लोक पर्व की बधाईबिन पौधों से बरसता नही ये मौसम न सावन में न भादो में,,
आवो श्रृंगार करें हम धर्ती माँ का कहीं पेड़ न रह जाये सिर्फ हमारी यादों में,,चलों खुद की आँसुओं से ही सींचे प्राणदायनी पौधे हम,,
गिन गिन के लो सांसे,बिन पौधों के सांसे हो रही है कम,,आवो धारा का श्रृंगार करें फल फूल का एक पौधे लगाएं हम,,
नभ चेतन में भावी जीवन में अमूल्य बृक्ष का दान करें हम,,आये है जब इस थल में तो क्यों न एक नेक काम करें हम,,
बृक्ष तज के मरुस्थल हो चुकी माँ धर्ती का पुनः सम्मान करें हम,,कोई जग में कोई मन में कोई आंगन में एक नेक पौधा जरूर लगाना,,
तृष्णा,फ़रेब,बैर,गरीबी दरिद्रता को मन,जग से दूर भागना,,सर्वाधिकार सुरक्षित देवेश आदमी

Harela Parv Ki Shubhkamnaye हरेला पर्व की शुभकामनाए

खुदेड़ डाँडी काँठी की ओर से आप सभी को हरेला की शुभकामनायें

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
         हरेला  आपको..........
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सुखों की हरियाली ,दे हरेला आपको |घरों में खुशहाली ,दे हरेला आपको ||
होली दे दिवाली दे हरेला आपको |मुस्कान की डाली दे हरेला आपको ||


सपन में नव उड़ान दे हरेला आपको |नित नूतन पहिचान दे हरेला आपको ||
देवों का वरदान दे हरेला आपको |ओज का आसमान दे हरेला आपको ||
तन नित प्रवहमान दे हरेला आपको |बल नित जाज्वल्यमान दे हरेला आपको ||
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
      हरेला पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनायें ||
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      ©डाoविद्यासागर कापड़ी
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹        16-7-2017

Chhui Darolyo ki छवीं दारोल्या की

छवीं दारोल्या की :-

कैमा बिंगाऊँ कैमा लगाऊँ आज दर्द उत्तराखण्ड कु ,
नाशा चपेट मा बर्बाद हुणुच आज प्रत्येक मर्द उत्तराखण्ड कु ,

आँखां बण्या छी लाल धतूर , छवीं लगाणुच हव्वा मा ,
दिन्न भर म्वारी ,म्वारी ध्याड़ी कनुच .सामबगत उडाणुच पववा मा ,

रिस्ता नाता बिगडी गेनी सब्ब ,कर्ज -  पात का बारा मा ,
मजाक उडाणुच गाँव गल्या भी , आपुडौं कु भी क्वी सारा ना ,

सुबेर उठिकी बर्मुन्ड़ पकड्यू चा ,सोच मा प्वाड्यूँचा भारी ,
परिवार का खातिर दिन भर ध्याड़ी ,बिसरी जांद ओ सामबगत कुटुमदारी ,

दागुडु कर्यूँचा खत्यां बित्यूँ कु , जैकु अलोग ना पलोग ,
आख्यूँ आंख्यूँ मा रिन्गणुच सबकु ,नाम धना छी बनी बनी का लोग ,
लोन व्हेग्यायी चबट् दारू मा लौटाणा की वेफर चिन्ता ना ,
खूँन् का आँशु रूणुच होश मा ,बेहोश कु बाद क्वी चिन्ता ना ,

नौन्याल रूणा छी ऐड़ाट्ट के , ओ धुत्त बण्यूँच खटुली मा ,
रोज कु झगड़ा कज्याणी की मार ,मुन्ड़ीली फर वेकी लटुली ना ,

नौन्यालूँ की फीस कौपी किताब ,लाला बाताणु च वेमा हिसाब ,
मुखड्युन्दा वेकी रात पोड़ींचा ,रूणु गंगजाणुच ओ बेहिसाब ,

सौं कसम खूब खाणुचा ,जै कै का समणी ओ बाल बच्चों का ,
ठगी ,ठगी का हालत भुरा कर्…

Jhoothi Shaan झूठी शान

हम लोग झूठी शान,देखा देखी और भौतिक सुख की लालसा न रखते तो न आज भरतु की ब्वारी की करतूत लिखनी पड़ती और न ही भरतू की ब्वारी की पीड़ा लिखने की जरूरत पड़ती।

शिक्ष।,स्वास्थ्य,सड़कें,पानी,बिजली,आदी को मोहरा बनाकर पलायन आखिर कब तक ?
जबकि सच ये है बुनियादी सुविधाएं पहाड़ में अब पहले से बेहतर हुयी है।

जहां भरतु की ब्वारी अब खेती छोड़कर शहरों के बन्द दो कमरों के सपने सँजोती है वहीं भरतु भी अब हल्या न रहकर राजनीतिक चापलूसी और फ्री दारू मीट भात पचाना सीख गया ऐसे में भला भरतु और भरतु की ब्वारी खेती क्यों करे वैसे भी बीपीएल और मनरेगा क्या कम है ।

आखिर पलायन कर भरतु और भरतु की ब्वारी अब पहाड़ पलायन पर बड़े बड़े प्रेरक लेख लिखते है पहाड़ की ब्वारियो की पीड़ा लिखते है हलाकि ये खुद पहाड़ जाने और पहाड़ याद में रोज बड़े बड़े भावनात्मक पोस्ट डालते रहते है।
खैर मुझे आज भी भरतु की ब्वारी और भरतु के पहाड़ वापस आने का इंतज़ार है ताकि करतूत और कहानी लिखने की हमे जरूरत ही न पड़े

सबसे बड़ा सच तो यही है न अब भरतु की ब्वारी पहले जैसे पहाड़ नारियों की तरह मेहनती रही और न ही भरतु खुद अब पहाड़ मानुष जैसा कर्मठ रहा प्रतिफल हम सबके सामने …

Dard दर्द

दर्द
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हर वक्त मुझे मरने का गम क्यों सताता है,,
ये मेरे घर का आइना मुझे बहुत रुलाता है,,

नींद में भी मुझे चलने की आदत सी है,,
ए कौन सा दुश्मन है मेरा जो मुझे नींद में भी चलाता है,,

रोज कोई न कोई इस दुनिया को अलबिदा कह देता है,,
उस के जनाजे पर मुझे नजाने क्यों रोना नही आता है,,

जो कल तक मुझ से अपने कर्जे के लिए झगड़ रहा था,,
आज देखो कम्जद मुझे रुला के खाली हाथ  जाता है,,

मेरे आँगन की इठलाती लितलियों को कौन उड़ा देता है,,
इन की खुसबू अपने साथ मेरी बेटी की याद जो लाता है,,

मैने सोचा भी नही था दुबारा माँ का प्यार मिलेगा,,
बेटी की लोरी सुनी तो सारा दर्द भुला दिया,,

रात भर जानबूझ कर टहला हूँ अपने घर के आंगन में,,
नींद न आने के बहाने बेटी ने फिर से गोदी में सुला दिया,,


सर्वाधिकार सुरक्षित देवेश आदमी

Besahare Ka Sahara Banke Dekh बेसहारे का सहारा बनके देख

तू जमाने भर का दुलारा बन के देख,
तू किसी की आँख का तारा बनके देख|
अपने लिए तो सभी जीते हैं सागर,
तू किसी बेसहारे का सहारा बनके देख |


विद्यासागर कापड़ी

Prajatantra Ke Rakhwale प्रजातंत्र रखवाले

प्रजातंत्र रखवाले

बदल रही है सभ्यता
बदल रहा परिवेश

लुटेरे घूम रहे  हैं
बना के साधु , "वेश"

शत-शत नमन करो इनको
ये प्रजातंत्र रखवाले हैं

मदिरा के प्यालों से
पानी की प्यास बुझाते हैं

बचना  इन धुर्तों से
स्वंय को जो सर्वे-सर्वा बताते हैं

राजनीति के कपट जाल में
माई-बाप बन जनता का शासन पर अधिकार जमाते हैं

बातें बड़ी-बड़ी और खोखले वादे
हर पाँच साल में आकर घर -घर ,तुमको बहकाते हैं

भेड़ बन हम क्यों भेडियों के आगे  नत-मस्तक हो जाते हैं

क्यों जाति -धर्म पंथवाद में फंस कर ,नारे उन्मादी हैं
आखिर क्यों ?मानवता को कर तिरोहित ,चम्मचा बन खुश हो जाते हैं .
राजेन्द्र सिंह रावत©

Ankhyun Ma Sankai ge waa आँखियूं मा सनकै ग्ये वा

आँखियूं आँखियूं मा सनकै ग्ये वा,
प्रेम  का बाटु  बिरड़ै ग्ये वा |
वीं क माया मा मि चकोर सि रो फफड़ाट कनु ,
टम,सिकर्या बणि क  टमकै ग्ये वा ||
सर्वाधिकार सुरक्षित दिवाकर बुड़ाकोटि

Pitra Diwas ki shubhkamnaye पितृ दिवस की शुभ कामनायें

पितृ दिवस की शुभ कामनायें |



बच्चों के ही सपनों के हित,

    बनता खाद व पानी है |
अपने को बूढ़ा है करता ,
         देता भरी जवानी है ||

बन जाता गदहा या घोड़ा,
             अपने सपने मारे वो |
एेक माँग पर उन पर अपनी,
            सारी खुशियाँ वारे वो ||

चाहो जो पूरा करता है,
            नींदैं अपनी दे देता |
खुद ही वो पतवार थामता,
           नाव सभी की खे लेता ||


जिद के आगे सदा हारता,
          विजय दिलाता बच्चों को |
खुद अपने आँसू पीकर भी,
 .          सदा हँसाता बच्चों को ||


ईशगृह में हाथ पसारे,
           बच्चों की खुशियाँ माँगे |
गिरते नयनों से टेसू जब,
           बच्चों हित हँसियाँ माँगे ||

पिता टाँगकर थैला नित ही,
             चक्कर काटे मन्डी के |
और दुकान में जा थामता,
            नित ही हत्थे कण्डी के ||


तिनका-तिनका जोड़ जोड़कर,
              बनता एेक घरौंदा जब |
नयनों में जल देकर सारे,
           छोड़ छाड़ चल देते सब ||


पिता अपना जीवन सौंपकर ,
           बच्चों को जीवन देता |
अपने हित दु:ख लेकर भी,
      खुशियों का कण-कण देता ||


पोछ सको तो सदा पोछना,
        पिता के नयनों का नीर…

फूल

मै फूलों पर था तो लोग आहें भर रहे थे,,
आज.......................फूल मुझ पर क्या गिरें अपनो ने मुहँ मोड़ा,
और.......…..................
आसमान रोने लगा,देवेश आदमी

Jon Ki Aas जोन की आस

जोन की आस
                (एक गढ़वाली गजल)

हे   हमुन   भी  देखी  जोन   केकी   मुखड़ी   म
हे     हमुन  भी  पालि  आस   केकी  जुकड़ी  म
पर य बात औरे छै कि सी हमरा नी हवे सकिन।

हे  हमुन  भी  पीनि  द्वी - बुन्द  केकी   यादो  म
जब   ऐनी   गेनी  मेरा  मौर - द्वार  बार - तिवार
हमारी भी ह्वे गिणति  निकमा-आवारा-बर्बादों म  पर य बात औरे छै कि सी हमरा नी हवे सकिन।

हे हम भी रेनी उड़ेन्दा जब लोग सुनिन्द ह्वेगिनी निर्दैई निठुर  दुन्या क डारा अर  गैणों क सारा
वींकी चिठ्यों  क  रसीला आखर  सुर्बुट पेड़िन।
पर य बात औरे छै कि सी हमरा नी हवे सकिन।

हे   हमारी  जिकुड़ी  भी  ह्वे  झर   वींकी  खुदन
जब  जेठ  ऐनी  रुड़ी  अर  सौण  लोंकी  कुरेड़ी
सचि नी पौंछी  होली  हिर्दै म ठेस वींका शकन।
पर य बात औरे छै कि सी हमरा नी हवे सकिन।

                         कवि- विक्रम शाह (विक्की)

नोट- सर्वाधिकार@सुरछित हैं

Kuchh Dohe कुछ दोहे

कुछ दोहे


1-बहुतेरे पग खींचते, दूजा बढ़ता देख |
   सागर कहिए क्या भला, एेसी जड़ता देख ||

2-मोदी के कायल हुये,सकल जगत के देश |
  भारत का भाने लगा, सबको ही परिवेश ||

3-सकल जगत में हो रहा, भारत का जयगान |
   मोदी पर अब हो रहा, सबको ही अभिमान ||

4-बहुतेरे नेता हुये,मोदी सा ना कोय |
  भारत माँ के पग सदा, श्रमवारि से धोय ||


सर्वाधिकार सुरक्षित डा. विद्यासागर कापड़ी

Mera Ishq मेरा इश्क़

शायरी
देवेश आदमी

Kash Mai Sabka Pyara Ban Jau कास मै सब का प्यारा बन जाऊं

कास मै सब का प्यारा बन जाऊं,
खुदा करे एक दिन तारा बन जाऊं,
 जिन्दगी में मुझे पाने की सब की चाह हो,
बस इतना दूर जाऊँ की दुलारा बन जाऊं,



आदमी

Palayan Kise Kahte Hai पलायन किसे कहते है..?

पलायन किसे कहते है..?

आज सभी को पलायन की चिन्ता है पर चिन्ता ही है चिन्तन नही। मन है पहाड़ों में जाने का पर मनन नही। लेखक बुद्धजीवी समाज सेवी NGO व कही अन्य लोगों को बड़ी चिन्ता है दुःख है बेदना है पलायन की पर क्या करें सब को मलाई से मतलब है दूध कोन पियेगा जब मलाई से पेट भर जाता है। मुझे भी बड़ी फिक्र है पलायन की पर उस पलायन की जो कुछ वक्त बाद महानगरों से गॉँव की और होगा
"फिर न तो घर होंगे न मकां होंगे हम यहाँ वहां जहां तहां होंगे"।
"खोजते रहेंगे हम अपने निसां पर न घर होंगे न मकां होंगे"।

उस रि-पलायन की चिन्ता है मुझे, खाएंगे क्या हम रहेंगे कहाँ हम,,? आज सब को पलायन पर बात करते देखता हूँ fb पर या व्हाट्सएप पर बहुत ग्रुप है या लोग है जो दिन भर पलायन की बात करते है पर खुद उन से सवाल पूछो की आप वापस गॉँव क्यों नही गए तो बोलेंगे भाई अब इस उम्र में क्या करूंगा।
या किस को बोलो आप पहाड़ों से क्यों आये सहर तो बोलेंगे उस जमाने मे पहाड़ों में कुछ था नही आज तो बहुत दूर नही पहाड़।
खुद की औलाद विदेश जाए तो तरक्की और दूसरे का पौड़ी से कोटद्वार भी आये तो पलायन, क्यों भाई यैसा कैसे हुआ …

Dhuvnya Whege धुवण्य ह्वै गे

धुवण्य ह्वै गे अब य जून!!
छलौरी चल यु काया बदलो!!
फुंगड़ी कु माटु म रबदले जुंला!!
अगास कु गैणा बण जुंला!!
ज्वानी कु चबोड छोड़ लाटा!!
जवठ म घनुड़ी सि घोल बणोंला!!

!!आदमी!!

Tu Sadani Sayani Rain तु सदनी ही सयाणी रै

सभी मायादारों थै समर्पित
~~~~~~
तु सदनी ही सयाणी रै !!
मै तब भी माया लांणू रै !!

तु औरों की बात करणी रै !!
अर मै तेरा गीत गाणु रै !!

तिन समझी घोर लाटू मै !!
समणी ही घात करणी रै!!

त्वे कभी भी ख्वे नि सकदु थै !!
ईले चुप सुरक सब देखणु रै !!

तु फूल बणी भोरों मा !!
जी भरी माया लाणी रै !!

मै जब भी आई पास मा !!
तू छुईई मुईई सी पट लुकणी रै !!

मै जोंन बणी कांठा सी !!
बस रोज त्वेथे देखणु रै !!

तेरी सोच मा झणी कू !!
मै हरपल त्वेथे भजणु रै !!

मै जिंदगी समझी अपड़ी त्वे!!
हर रोज पूजा पूजणु रै !!

तु निकली चतुर घिंदुडी सी !!
सुदी रोज मै थै ठगणी रै !!

भौत ह्वेगी अब भागमभाग !!
बिदा त्वेसी होणू छौ !!

जख भी रै तू राजी रै !!
बस सदनी हैंसणी खेल्दी रै !!


~~~~~
सर्वाधिकार सुरक्षित ~ सुरेन्द्र सेमवाल

Hazir Hounga हाजिर होऊंगा

हाजिर होऊंगा,समय समय पर
अपनी उपस्थिति,दर्ज कराऊंगा
तुम हर बार मुझे,इग्नोर करना
मै हर बार,बेहतर करके आऊंगा ¶

अपनाना पड़ेगा तुम्हे,मुझे एक दिन
मै बस,कर्म करता जाऊंगा
दिखाऊंगा मै भी हूँ,एक अनमोल रत्न
तुमसे ही वाह कहलाऊंगा ¶

दी नही तवज्जो,जिन्होंने कभी भी
उन्हें कीमत,अपनी बताऊंगा
है नही जगह,दिलों में जिनके
वहां बसेरा,अपना बनाऊंगा ¶

नींदों में आकर,ख्वाब बनूंगा
दिलों दिमाग में,छा जाऊंगा
देखा नही जिन्होंने,कभी प्यार से
उनके लिए,सपना बन जाऊंगा ¶

दूर रहकर भी,पास रहूंगा
माहौल ऐसा,बनाऊंगा
चलेंगें जहां भी,पग तुम्हारे
मै साथ साया,बन के मंडराऊंगा ¶
~~~~~~~
कविता ~ सुरेन्द्र सेमवाल

Kuchh Guftgu Hi Kar Lo कुछ गुफ़्तगू ही कर लो

बहारें ढुंड़ेंगी हमें हम नजाने फिर कहाँ होंगे..?
मत्ला तो ये है वो दिन न फिर अल्फांजों में बंयां होंगे,,
तकदीर से मिले हो तो कुछ गुफ़्तगू ही कर लो,,
जहाँ सब चले गए क्या पता हम भी वहाँ होंगे,,

आदमी

Main मैं

मैं

मैं अपने "मैं" को तराशता हूँ
मैं खुद अपनी मंजिल और रास्ता हूँ

मैं भरा हूँ स्वाभिमान से
एक क्षण को भी फिरा नहीं ईमान से

मैं लिखता हूँ कविता गाता हूँ गीत
नहीं किसी से वैर भाव सब मेरे मन के मीत

मै हर परिस्थिति से नियति से लड़ता रहा लड़ाई
जीत गया कभी ,कभी चोट भी खाई

कविता में लिखता मैं अपने मन की बात
उजियारा दिन कभी ,कभी अन्धेरी

करता हूँ पन्ने काले घिसता हूँ कलम
युग -नेता सिद्ध पुरूषों को बारम्बार नमन

राजेन्द्र सिंह रावत©

Lo Aa Gayi Barish लो आ गयी बारिश

लो आ गयी बारिश
लेकर  तेरा   पैगाम
भीगती आंखो ने
लिख दिया तेरा नाम
तू भी आ जा
बारिश करती  बेचैन
बादलो के संग
बरस रहे  नैन
देख लूँ तुझे
नैनो की बुझे प्यास
बरसती बुन्दों संग
तू आ जाये काश
बरसात की ये शाम
दे रही तेरा पैगाम


नादान

Shravan श्रावण

श्रावण  


मनहर कुवलयों की मालैं हैं कासारों में,
निकले दादुर जलधर का पाकर आमंत्रण।|
झलक रही मुस्कानैं अटवी के अधरों में,
तट का नद पर कहाँ रहा है आज नियंत्रण।।


कुम्भी भरे हुँकार मस्त होकर कानन में,
छटा हरित पात की चितलों को पास बुलाती।
रत्नाकर. से मिलने को आतुर हैं नदियाँ ,
फड़की उत्स की बाँह चञ्चला गीत सुनाती।।


शाखामृग मुदित हो शाखी पर चढ़ जाते,
वनहरि का भी सजता है नित नूतन सिंहासन।
बनी भू दादुर,व्यालों की क्रीडास्थल,
वराह खेत में आकर पाते सुरभित भोजन।।|


मेघों का गर्जन त्रास की पाती लाता,
चन्द्रमौलि करें न मुग्ध हो ताण्डव नर्तन।
फिर भी यह मन मयूर होकर हर्षित गाता,
मिलता वसुन्धरा को मेह से नूतन जीवन।।


©डाoविद्यासागर कापड़ी
           18-6-2017

Khatyu खत्यूँ

"खत्यूँ"

खैंचदी खैंचदी, ऊबैं ऊबैं,
ऊ हौरी जी कड़ुकुड़ु ऊंदैं ऊंदैं।

हथ्यौं हथ्यौं मा ऊ, खूब ख्यलै
पण जरा जरा कै ऊ रड़कदू गै।

ऊदैै ऊबैं,.ऊबैं ऊदैं
खत्तैंई खतैई,
खड्याण जुगा ह्वैई
दा रै....खत्यूँ कखै कु

स्वरचित/*सुनील भट्ट*

Gailya Ghuguti गैल्या घुघती

गैल्या घुघती

हे  गैल्या घुघती दिदै  पैंछा लो पँखुर
भिटें  औन्दु   लो   मैं   मैतियों  सणी
मिटै  औन्दु रे गैल्या जुकड़ी रणमणि।

दी दै पैंछी अपड़ी मीठी मयाळी गळि
खुद मिटै औन्दु गैल्या भेजी-भूलों की
बुरांश  फ्यूंली  बरमिकोंल  फूलों की।

दी दै पैंछु अपणु स्वाणु रूप रंग ढंग
बर्ति   औन्दु  लो   मैं   ऋतु    बसन्त
सजै    देन्दु    मैं   अफुड़ो   हिमवन्त

दी  दै  पैंछु  अपणु  सीदू ठण्डो सुबौ
बन्धै  औन्दु  धैर्य धिर्जन टूटीं जुकड़ी
हंसे औन्दु गैल्या रोलिँ खोलीं मुखड़ी।

दी  दै  पैंछि   अपणी  मिठी  घिच्ची
लगे   देन्दु    पाड़े  मैं  खेरी  बिपता
सुणै औंदु अपणी संस्कृति सभ्यता।

दी  दै  अपणि  अपणिती  लो  शांकी
समझै  औंदु मैं लो अपणा ब्वै - बाबु
फोंजि औंदु बुढेन्दी आंख्यों क आँसू।

         हे   गैल्या      घुघती!
         तेरु ही दैणदार रोलू।

              कवि-विक्रम शाह(विक्की)

अबारिं दौं

अबारि दौं तु बेटा घौर जरूर ऐ
तेरी ब्वे सगत बीमार च
लगदा मंगसीर तेरी छोटी भूलि सरू कु ब्यो चा
दहेज मा ऊंकि मांग
मोटरसाइकिल अर कार च!!!
पिछला के सालो बटि लून भी पास नि हुणू
कनि या हमारी निरदयी सरकार च
क्या कन अब तु ही बतो बेटा
ये बुडेन्दु दों तेरू बुबा बहोत लाचार च!!!
तेरा जंया भी चार साल पुरा ह्वेग्या
कब मनियाडर ओलु तेरू
नजर मेरी हमेशा डाकघर च!!!
कन नौकरी च बेटा तेरी जेमा छुट्टी भी नि मिलदि
या तु अपुणु पहाड नि आण चान्द
ऐस आराम वा शहर की रौनक वा मशीनी जिन्दगी
पर येखकि हमारी पहाड की ठण्डी हवा युं बांजे की डाल्यो कु छेल
मां बापु कु दगुडु तेरा अपना ग्वालापन का गेल
तेरी तें शहर की चकाचोंद ये पहाड का सामणि बेकार च!!
बाटा देखणि या डाण्डा कांठि
त्वे ते अपणो मु बुलाणि च
ऐ जा लाडा आंखि तरसि मेरी
आखिर येख तेरू घार च!!!!!
                                       दीपू बिष्ट
                              ढमढमा चमोली गढवाल

rigved ऋग्वेद

विश्वा उत त्वया वयं उदन्या इव!
अति गाहेमहि द्विष:!!
         ऋग्वेद  2-7-3
हे मनुष्यों ! (मनुष्य) जैसे जल की धारा प्राप्त स्थान को छोड़ कर आगे बढ़ जाती है
ऐसे ही शत्रुता व द्वेष का भाव छोड़ कर तू मित्रभाव को प्राप्त होकर शुभ कर्म कर .

शुभ प्रभातम
संकलन/प्रेषण.
राजेन्द्र सिंह रावत
दि०18/6/2017

Kadi Davai कड़ी दवे

कड़ी दवे का। बाद ही रन्दू
       जर मुंडारू   सिर गाता  कु
       दुख   का   बाद  ही  ओन्दु
       सुख नियम  च बिधाता  कु
शांत   राख   शीतल, चित्त  चिन्ता मा
       दुःख  ओन्दु    जीवन   मा
       सुख का मतलब समझुणा।
       धैर्य राख......................।

🌹🌹🌹सुप्रभात🌹🌹🌹

         कवि-विक्रम शाह(विक्की)

Mere Dohe Part 2 मेरे दोहे भाग २

मेरे  दोहे


1-पथ में मित्र अमित्र का, कब रहता है भान |
   जब पग में काँटा चुभे ,तब होती पहचान ||

2-जो माँ देती अन्न को, जो देती है नीर |
  जो उसको गाली करे, तन को डालो चीर ||

3-कब तक सैनिक के यहाँ, बँधे रहेंगे हाथ |
   कहो सीमा पार करो, काटो धड़ से माथ ||

4-माँ का आँचल ओढ़कर, रहते जो गद्दार |
   थामो तुम तलवार को, करो उदर पर वार ||

5-छुपकर हैं रहते कई, आस्तीन के साँप |
  भारत माँ ममतामई ,सहती सारे ताप ||

6-खाते भारत भूमि का,कहते पाकिस्तान |
    उनका सीना चीरकर ,भेजो कब्रिस्तान ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

Palayan Ya Tarkki पलायन या तरक्क़ी

पलायन या तरक्क़ी
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खुद पहले हमें तय करना होगा महें चाहिए क्या।

पलायन पर हर इन्सान की अपनी अपनी धारणा है जरूरत के अनुरूप पलायन हो रहा है , देश से भी प्रदेश से भी,,कोई मूलभूत शुबिधा के लिए घर से पहाड़ से या देश से पलायन कर रहा है तो कोई अपनी महत्वाकांगसावों के लिए। किसी को सुकून नही धन दौलत माया से तो किसी को बेहतर जिन्दागी या बेहरत पढ़ाई चाहिए।
उत्तराखंड आज पलायन की जिस बिस्पोटक दहलीज पर खड़ा है वही भारत देश या देश के अन्य राज्य भी है पर हम लोगों ने १७ सालों में अचानक अपनी बिकाश की गाड़ी १ से ५ वें गेर में डाल दी बस वही खल रहा है। अचानक पहाड़ों से बड़े बड़े गायक खिलाड़ी या नेता अभिनेता ये बद्धजीवी लोग देश के सामने निकल पड़े, २  साल में भारत के राष्ट्रपति २ बार गढ़वाल आये थे PMO की नजर भी अचानक पहाड़ों पर पड़ी। ब्यापार कल कारखाने बने तो हम लोगों को tv में देखा गया और हम पलायन की चिन्ता करने लगे है। वरना पहले कम करते थे हम पलायन की बात। जो लोग आज पलायन की बात करते है २० साल पहले वो लोग बोलते थे पहाड़ों में रखा क्या है जाएं न तो क्या करें हम। मेरे हिसाब से केदारन…

Musafir Hoon मुसाफिर हूँ

मुसाफिर हूँ, वर्षों से
निरन्तर प्रयास में हूँ
इंसानों की भीड़ मे मै
इंसानियत की,तलाश मे हूँ ¶

यूँ तो भीड़ बहुत है,इंसानों की
पर ऐसे इंसान की,फ़िराक में हूँ
करे प्यार जो,बिना स्वार्थ वश
उस महान शख्स की,तलाश में हूँ ¶

छला है दुनिया ने,अपना कहकर
अब अपनों से भी,डर लगे
ढूंढे आँखें उस एक शख्स को
जिसमे मन ये,जी भर लगे ¶

अनुभव से तो बस यही सीखा है
दुनिया ने झूठ को भी वाह कहा
किया प्यार जिन्हें,खुद से जादा
उन्होंने ही हमे,बेवफा कहा ¶

दिखावे की दुनिए ये,जो दिखे वो बिके
दिखावा आया, न बिकना आया
इसलिए निकले,खजाने के खोटे शिके ¶
~~~~~~
पंक्तियां ~ सुरेन्द्र सेमवाल

Awagaman आवागमन

आवागमन

ना जाने कितने जन्मो से
संयोग बना है आपसे

स्नेह ,प्रेम अपनत्व के रिश्ते
जीवन भर साथ थे

भूला नहीं बचपन अपना
स्नेह,नेह का कलकल बहता था झरना

जा रहे हो छोड़कर !
दुख होता है ,मन रोता है

जानता हूँ मरण सत्य है
और वस्त्र बदलना है आत्मा का

आवागमन के इस चक्र में
विलय होना भर है देह का

ना जाने अब कब मोका मिले संगम का
पुन: संयोग घटित हो आपसे मिलन का

मेरा शत -शत कोटी प्रणाम आपको अर्पित है
 छोड़ गये हो जो मधुर स्म्रति ,वह क्षण ,प्रहर ,दिवस अभी  संचित है.
राजेन्द्र सिंह रावत©
22/6/2016(RSR)

यह कविता मैंने अपने नाना जी के देहावसान पर दि०29/8/2011को लिखी थी.

Stri Jab Mulayam Roti Ban Jati Hai स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है

स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है
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आज रोटी बनाते हुए
ये खयाल आया
स्त्री रोटी सी है
जिसे बेला जाता है
समाज रूपी बेलन से
बेलन देता है आकार
और वो बेलन के मन मुताबिक
संस्कारो के आटे में लिपटी
परि धि में बँधी
ले लेती है आकार

मायके में एक तरफ़
अधकच्चा पकाकर उसे
भेज दिया जाता ससुराल
दूसरी तरफ़ पकने के लिय
वो फ़िर से होती तैयार
दूसरी तरफ़ पकने पर
रिश्तो की गर्मी से
वो फूल जाती है
बहू, पत्नी,माँ बनकर
मर्यादा की आग में
तपकर निखर जाती है

कभी कभी जाने अनजाने में
गर जल जाये ये रोटी
कोई नहीं छूता उसे
फेंक देते है एक तरफ़
बिना जाने ये
वो खुद जली नहीं
उसे जलाया गया है
किसी के हाथो ने

न जले वो तो
उसे खा लिया जाता है
वो हर रिश्ते की भूख मिटाती है
स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है
स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है


सर्वाधिकार सुरक्षित रामेश्वरी नादान

Geet Kumaoni गीत कुमाऊनी

गीत

आई जाये गौं देखण ,गाड़ा पूँगा तीर |
पात में खाइ जालै भुला झिंगोरा की खीर ||

हिक-हिक लागली बाटुली,आली त्वैकै याद,
आलो तेरी जिबोड़ी में ,चुड़कानि को स्वाद |

भेटि जालै आमा-बुबु कै,ल्हि जालै  आशीष,
ठण्डो पाणी पी धारूँ कै ,मिटा जालै तीस |

तू  गौं को लाड़िलो चेलो ,पहाड़ों को वीर |
पात में खा जालै भुला,झिंगोरा की खीर ||

दियो जगा जालै भुला,द्यापतों का थान,
लै जालै तू खुशी खुशी नांगारा निशाान|

भगवती थानचढ़ालै,चूड़ि,बिंदी,चुनरी.|
ल्हि जालै कदुवा कांकाड़ा,झ्वाला भरी-भरी |

गौं की छू आत्मा त्वे मैं,गौं को तू शरीर |
पात में खा जालै भुला ,झिंगोरा की खीर ||

आई जाए गौं देखन,गाड़ा पूंगा तीर,
पात में खा जालै भुला झिंगोरा की खीर ||

©डाoविद्यासागर कापड़ी

Ye Dala Ka Chhailu ये डाला का छैलु

"ये डाला का छैलु"

ये डाला मा अब क्वी,
फल नी लगदु
बल यु डालु अब क्वी बी,
कामौ नी च।

ये डाला मा अब क्वी,
फूल नी सजदु
बल यु डालु अब कैकु बी,
नामौ नी च।

ये डाला मा चखुली बी,
अब घ्वोल नी बणौदी
ये डाला मा बैठी,
घुघती गीत नी गौंदी ।

यु डालु अब ज्यादा,
बचै बी नी सकदु,
दुख, विपदा  खैरी
बिगैं  नी सकदु ।

पर ये डाला का छैलु,
कैकु कुछ त कर्युं होलु।
जु  बैठदी  पर्वांण,
यु  तिसालु  पराण

सदनै  की  तीस
कुछ  बुझैई जांदी,
चैन का ढिकणौं मा,
मीठी सी नींद फस्वरी आंदी।

ये डाला का छैलु,
कैकु कुछ न कुछ त बुत्युँ होलु ।
ये डाला का छैलु,
हाँ ये डाला का छैलु ।।

सर्वाधिकार सुरक्षित *सुनील भट्ट*
22/06/17⁠⁠⁠⁠

Sakshar Bharat साक्षर भारत

साक्षर भारत

सीखी     आखर-आखर
बणोण   भारत   साक्षर
अंगूठू     लाण     छुटलु
केला    सब    हस्ताक्षर
अनपढ़  तें  पढ़ोला  अर
साक्षर  भारत   बणोला।

अब   नी    रेलू     क्वी
भारत      मा    निरक्षर
संकल्प ल्या  साक्षरता
दिवस  क   मोका   पर
अनपढ़ तें  पढ़ोला  अर
साक्षर   भारत  बणोला।

विकास  का  रास्ता मा
समै   की   जु  दुरी   च
ये  वास्ता   हरऐक   तेँ
साक्षर  होण  जरूरी च
अनपढ़ तें   पढ़ोला अर
साक्षर   भारत  बणोला।

ये  जमना  निरक्षर  रेणू
पशु    का   बरोबरि   च
साक्षरता    का    बिगर
जिंदगी  जूण  अधूरी च
अनपढ़ तें  पढ़ोला  अर
साक्षर  भारत  बणोला।

                          विक्रम शाह(विक्की)
                       बजियाल गाँव घनसाली
                              टहरी गढ़वाल
नोट--सर्वाधिकार @ सुरक्षित लेखक  म।

Hyund ka bad ह्यूंद का बाद

ह्यूंद   का   बाद ही ओन्दु
        बसन्त   फूल     पातियों
        बर्खा   बर्खि   ही।  ओन्दु
        मोळियार  डाळि  बुर्दियों
धाक राख धाफना यखुली अंध्यारा मा
        जोन    लुकदी सारा  दिन
        रात    अंध्यारी   चम्कुणा
        धैर्य राख.....................।
      🌹🌹सुप्रभात🌹🌹
        कवि-विक्रम शाह (विक्की)

Samansutam समणसुत्तं

उवसमेण हणेकोहं,माणं मद्यवंया जिणे!
आयं चडज्जव भावेण,लोभ संतोषओ जिणे!!
     :--समणसुत्तं.736

क्षमा से क्रोध का हनन करें,मादर्व से मान का को जीतें ,आजर्व से माया को और संतोष से लोभ को जीतें.


शुभ प्रभातम


संकलन:-
राजेन्द्र सिंह रावत
दि०22/6/2017

Chaumasi Dohe चौमासी दोहे

चौमासी दोहे

1-वृक्ष धरा की साँस हैं,जीवन के हैं मूल |
  इनको जो है काटता , करता भारी भूल ||

2-यदि तुम काटो एक वृक्ष ,दस को देना रोप |
  होगा प्रलय अन्यथा , होगा भू पर कोप ||

3-खूब लगाना पेड़ तुम ,आये जब चौमास  |
  नित ही तब करती रहे ,यह धरती परिहास ||

4-हरियाला प्रदेश हो ,नदी भरे किलकार |
  दोनों ही इस देश के ,जीवन के आधार ||

5-रूख बिना पानी कहाँ ,पानी बिन नहिं धान |
  करले बन्दे पेड़ में ,जीवन की पहिचान ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

dadu mi parvato ku vasi दादु मि पर्वतौ कु वासी

दादु मि पर्वतौ  कु वासी ,
खाणुं नि खान्दू मि बासी तीबासी..
हर कैसे बच्यांदु मि हिसाब से ,
ज्यादा नि करदु मि चापलासी ..
मिठ्ठी मेरी बोली भाषा , ,
उत्तराखंड कु छू मि निवासी ..
दादु मि पर्वतौ कु वासी ,
खाणुं नि खान्दू मि बासी तीबासी..

कचर पचर मि पसंद नि करदु ,
यांक वजे से ,सेहत मेरी अच्छी खासी ..
हैंसणु हसाणा कू काम च म्यारु,
देख नि सकदु मि कैका मुख पर उदासी ..
काम काज मा सरम नि करदु ,
बाबू, कलेक्टर या हो चपरासी .
दादु मि पर्वतौ  कु वासी ,
खाणुं नि खान्दू मि बासी तीबासी.
.
अपणा पूर्बजों कु नाम उठानु और बढ़ाणु ,
ये चा मेरी मन्न मा लगीं भारी  गासी  .
देवता बणी की आशीर्वाद द्याला,
हम्म भी रौला सदा ओंका अभिलासी .
काम केरिकी एन्नु दिखाओ ,
कि मिल जाओ जो तुमथें सब  की शाबासी ,
दादु मि पर्वतौ  कु वासी ,
खाणुं नि खान्दू मि बासी तीबासी.
.
सर्वाधिकार सुरक्षित लाल चन्द निराला ...

Mere Teshe Medhe Sher मेरे टेढ़े-मेढ़े शेर

मेरे टेढ़े-मेढ़े शेर

1-उसके बगैर अधूरा सा सावन लगता है,
उसके बगैर अधूरा सा दर्पन लगता है|
चले तो जाता हूँ मैं बागवाँ गुलाब में,
पर उसके बगैर कहाँ मेरा ये मन लगता है ||

2-ऐ ईश, यौवन की वो सारी बातें लौटा दे,
  वो राह पर उनसे हुई मुलाकातैं लौटा दे|
दिन जैसे चाहे तू बेशक दिया करना,
पर मुझे वो करवट बदलती रातैं लौटा दे ||

3-न जाने उसकी किस बात का असर हुआ मुझ पर,
आज भी उसकी परेशानी पर परेशान हो जाता हूँ मैं ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी
            27-6-2017

Azam आजम

आजम

केवल शीशी में ही गरल नहीं होता है,
होता ये रसना से निकले शब्दों में भी |
देशद्रोह केवल गोली से कब होता है,
छुपकर दौड़ रहा होता है नब्जों में भी ||

करते सैनिक माँ की रक्षा खेल मौत से,
उनको तेरा गाली देना यही जताता |
आजम तेरे रग में बहता देशद्रोह है,
तेरा इक-इक शब्द सदा से यही बताता ||

कैसे भारत माँ को डायन तू कहता था,
अब मारी है चोट वीरों की कुर्बानी पर|
आज मौन हैं पुरस्कार लौटाने वाले ,
कौन प्रतिकार करे तेरी मनमानी पर ||

तू भी माँ का बेटा है कैसी नादानी,
वीरों का अपमान सदा करते आये हो |
माँ को गाली देकर जिन्दा नहीं समझना,
आजम नित पल-पल ही तुम मरते आये हो ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

Palayan Ek Chintan पलायन एक चिन्तन

यह तो मानना पडे़गा की,युवा वर्ग पहले से ज्यादा पलायन पर चिन्तन और चिन्ता कर रहा है.
दो -चार लोग जो अच्छी नौकरी प्राप्त कर चुके हैं उनके अलावा एक बहुत बड़ी संख्या उन प्रवासीयों की भी है जो छोटी-मोटी नोकरी में गुजारा कर रहे हैं .
उनके लिए महानगरीय जीवन केवल एक स्वप्न है ,बीवी-बच्चों के नाम पर वो बाहर जा बैठे हैं,और कुल जमा पचास गज तक का एक मकान उनका लक्ष्य बन गया है .
हमने इसके लिए बहुत कुछ खो दिया ,जिसका हमें अंदाजा भी नहीं.
लेकिन हमारे रोने से क्या होगा यदि सचमुच हमें पहाड़ की चिन्ता है तो हमें सबसे पहले बाहर बसने का विचार त्यागना होगा ,और परिवारों का पुन:घर गांव में आबाद करना होगा नौजवान -वर्ग हर समाज की रीढ है मुझे आशा ही नहीं विश्वास भी है यदि वह तय कर ले तो उत्तराखंड का हर गांव फिर आबाद होगा .
हम पलायन -पलायन करते रहे तो भी लोग देहरादून ,दिल्ली, रामनगर ,हल्दवानी ,आदि कस्बों और महानगरों को कुच करते रहेंगे अत: जो सचमुच गंभीर है उसे पहाड़ को कर्मभुमी बनाना होगा, यदि आज किसी कारण वश बाहर है तो एक समय सीमा निर्धारित करे कि,मैं इस समय तक वापस पहाड़ चला जाउंगा ,तब भी पहाड़ का भला होगा ,…

Ansuo Ki Barish आंसुओं की बारिष

किसी को सावन की पहली बारिश प्यारी लगी
किसी को टपकते छत छुरी कटारी लगी
अज मेरा दिल भी जार-जार रोया
लोगों को मेरे आंसुओं की बारिष अधूरी लगी

आदमी

Kavita कविता

कविता

कविता मन के उदगारों का गीत हुआ करती है
पीडित -व्यथित जन के मन का मीत हुआ करती है

कविता वह मंत्र है जो देती मन को शान्ति
मिटा देती है जो तिमिर आव्रत लोक की भ्रान्ति

मन में ,प्राणों में श्वासों-सहवासों में
अध्ययन में ,चिंतन में,आचार में,विचार में
जीवन में,जीवन के उमंग-तरंग में

शुभ -संकल्प में ,आत्मचितंन में ,क्रोध-क्रंदन में
आत्मा में ,परमात्मा में और सद-महात्मा में

है जिसकी सुवासित  गंध
बसी एक कविता ही तो है !

हाँ--
मैं कवि हूँ नहीं
किन्तु जीवन देखो --
एक कविता ही तो है .

©राजेन्द्र सिंह रावत
18/5/2017(9.30)

प्रकाशित रचना
सन-2005
14/10/2005

Purush Patthar Hain पुरुष पत्थर है

पुरुष पत्थर है
----------------------
पुरुष पत्थर है
सच ही तो है
ऐसा पत्थर जो
ढाल बनकर खडा है
अपनो के बीच
चट्टान सी हिम्मत लिये
परिवार की नीव को
मजबूत आधार देता हुआ
पिता ,भाई, पति रुप में
खडा है रक्षक रुप में

सर्वाधिकार सुरक्षित सुनीता रामेश्वरी नादान

Log लोग

लोग

जब जिन्दगी में कभी मसहूर हो जाते हैं लोग ,
अपनों से और अपने से दूर हो जाते हैं लोग |

भूल जाते हैं मुसीबत में किसने साथ निभाया ,
इस कदर कैसे नशे में चूर हो जाते हैं लोग |

जमीन को भूल जाते हैं आसमाँ की चाह में ,
ऊँचे कद की छाँव में मजबूर हो जाते हैं लोग |

बनावटी पानी और बनावटी पानी के खातिर ,
बस अपने तिलिस्म के मजदूर हो जाते हैं लोग |

जब जिन्दगी में कभी मसहूर हो जाते हैं लोग ,
अपनों से और अपने से दूर हो जाते हैं लोग ||


©डाoविद्यासागर कापड़ी

Myar Desha Ka Sipai म्यार देशा क सिपाई

'म्यार देशा क सिपाइ' (कुमाउनी कविता): पूरन चन्द्र काण्डपाल (Pooran chandra kandpal)

म्यार देशा का सिपाइयो तुमुकैं म्यर प्रणाम, धन तुमरी बहादुरी धन तुमौरौ काम । म्यार... क्वे गुरखा सिक्ख बिहारि तुम क्वे जाट पंजाबी, क्वे कुमाउनी क्वे गढ़वाली क्वे मराठा मद्रासी, क्वे राजपूत डोगरा नागा सैनिक आलीशान । धन तुमरि... नेफा लेह लद्दाख सियाचीन कारगिल क डान, रण कच्छ क सीमार छी या तात रेगिस्तान , दुश्मण क हरजाग मिटाय तुमूलै नाम । धन तुमरि... कतु लड़ै लड़ी तुमुलै आजादी का बादमा, सैतालिस बासठ पैंसठ इकहत्तर निन्यानबे का सालमा, दुश्मण हारौछ हमेशा तुम जीता संग्राम । धन तुमरि... इकहत्तरै लड़ै मजी देख तुमौरौ वेष, दुश्मण ल हथियार डावा जनम बंगलादेश, दुनिया चाइये रैगेई दिल आपण थाम । धन तुमरि...


लेबनान कांगो गया तुम सियारलोन कोरिया, श्रीलंका मालदीप गया मोजाम्बिक सोमालिया, दुनिया में पुजाय तुमुलै शांति क पैगाम । धन तुमरि... न हिन्दू मुसलमान सिख इसाई छिया तुम हिंदुस्तानी, मातृभूमि पर हया न्यौछावर अमर बलिदानी, तुमरि बहादुरी कणी म्यर देश क सलाम । धन तुमरि... दम निकई आह नि करी छाति में गोई खैछ, तिरंगै की शान …

Dholki Bichari ढ्वलकी बिचरी

फिर से एक बार अपणा उत्तराखंड का बाजौं तैं समर्पित एक रचना

       "ढ्वलकी बिचरी"

ढ्वलकी बिचरी कीर्तनौं मा,
भजन गांदी, खैरी विपदा सुणादी।
पढै लिखैई बल अब छूटीगे,
एक सुपन्यु छौ मेरू, ऊ बी टूटीगे।

ब्वै बुबा बल म्यरा, दमौ अर ढोल,
अब बुढ्या ह्वैगेनी।
भै भौज डौंर अर थकुली, गरीब रै गेनी।
छ्वटी भुली हुड़की झिरक फिकरौं मा,
चड़क सूखीगे।
हंसदी ख्यल्दी मवासी छै हमारी,
झणी कैकु दाग लगीगे।

ब्वै बाबा, भै भौज भुली मेरी बेचरी
कै बेल्यौं बटैई, भूखा प्वटक्यौं बंधैई
भजन गाणा छन, द्यव्तौं मनाणा छन।
मी ल्हीजांदु कबर्यों कुछ त,
ज्यु बुझाणा छने।
मामा मस्क्या बी तखुंदै कुछ,
काम खुज्याणा छन।

देखी हमरी या दशा,
औफार डीजे वीजे विलैती बाबू ,
गिच्चु चिड़ाणा छन,
ठठा बणाणा छन, दिल दुखाणा छन।
ढ्वलकी बिचरी खैरी लगौंदी, ढ्वलकी बिचरी।।

सर्वाधिकार *सुनील भट्ट*
17/06/17

Ajuki Maya अजुकी माया

नमस्कार मित्रों.... 07/07/17
सबका भला करे भगवान, सबका सबविधी हो कल्याण..
          "अजुकी माया"
कबर्यों ना ज्यू बी मरण प्वड़दू दिदौं
सची ना बच्चों बान्यौं,
क्य क्या नी कन प्वड़दू भयौं।
मेरी बी द्वी ब्यटुली छन,
म्यरा जीबन मा रौनक छन।
मेरी पराणी छन द्वीई,
मेरी ज्यू जान छन द्वीई।

बच्चों छोड़ी बच्चों बान्यौं,
जब परदेश जांदु,
मुखड़ी देखी, बच्चों जनैं
पापी पराण टपरांदु,
गौला भ्वरैई ऐ जांदू,
जिकुड़ी झर्र झर्र झुरांदु,
परदेशौं मा भैर लुखौं देखी,
अपड़ु दिल तैं बुथ्यांदु
अर अफु तैं अफीकी समझांदु..
कि मी क्या "अजुकी" छौं?

सौब यनी म्यरा जनी अपड़ा अपड़ा बच्चों तैं,
ज्यू जान से च्हांदा होला।
सौब यनी म्यरा जनी बच्चों खातिर फिरड़ा फिरड़ी,
सुख चैन खुज्यांदा होला।
दुख तकलीफ ऊठांदा होला,
मी जन सुपन्या गठ्यांदा होला।
अर हमरा ब्वै बुबौं न बी त हमतैं यनु कै ही सैंती पाली होलु ।।

स्वरचित/**सुनील भट्ट
0707/17

Jau AAnkhyu ma जौं आंखियों मा

जौं      आंखियों    मा     आज,
अंगरों    की   आस    अंगरली,
स्वाणा-सुखिला-सुपिन्या बणी
तों      भविष्या      मा    भोळ,
विधाता    भलु   भाग   बाँटली,
आँखा    बुझी    अंजूळी  भरी।

       शुप्रभात दगड़ियों

     विक्रम शाह(विक्की)

shweta श्वेता

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु :सश्र्रणोत्यकर्ण:
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यामि वेत्ता तमाहुरग्रयं पुरूषंमहान्तम्!
     श्वेता०3/19
परमेक्ष्वर बिना हाथों के पकड़ लेता है ,बिना पावों के गति करता है ,बिना आंखों के देखता है और बिना कानों के सुनता है.
जो कुछ जानने योग्य है उसे जानता भी है परन्तु उसे जानने वाला कोई नहीं ,उसी को आदि महापुरूष यानी परमेक्ष्वर कहते हैं.

शुभ प्रभातम

संकलन:-
राजेन्द्र सिंह रावत
दि०19/6/17

गौं मेरू

याद ओन्दु नैतें आज अपुणु गौं
वू कच्चु बाटू वू बांजे डाल्यो कु छेल
सब कुछ ख्वेग्यों आज ये शहर की भीड मा
हरचेलि हमुन वू बचपन मा गुल्ली डण्डा कु खेलण
वा बसग्यालि रात,वुं चुलों की गर्म आग
वु क्वेला मा सेक्यीं रोटी,अर दगड्डा मा कंडालि कु साग!!
गौं कि चोपाल मा देर रात तक गप लगांणु
यीं शहर की दौड धूप या मशीनी जिन्दगी
हर जगहा धुंवा अर हर गली मा गन्दगी
चला वापस चलि जौला
अपुणु गौं अपुुणु मुलुक!!!!
                                  दीपू बिष्ट
                           ढमढमा चमोली गढवाल

Dhairya Dhirjan धर्य-धीरजन

धर्य-धीरजन

धैर्य   राख  धिर्जन,  खेरी  बिपदा  मा
       घाम अछलेन्दु ब्याखुन्यों
       भोल     सुबेर    चमकणा,
आस राख बिश्वास, ओखी आफद मा
        खंगरी  होंदी  ह्यूंद  डाली
        नई    क्वँपळी     फ़ुटणा।

        ह्यूंद   का   बाद ही ओन्दु
        बसन्त  फूल  पातियों मा
        बर्खा   बर्खि   ही।  ओन्दु
        मोळियार  डाळि  बुर्दियों
धाक राख धाफना यखुली अंध्यारा मा
        जोन    लुकदी सारा  दिन
        रात    अंध्यारी   चम्कुणा
        धैर्य राख.....................।

       कड़ी दवे का। बाद ही रन्दू
       जर मुंडारू   सिर गाता  कु
       दुख   का   बाद  ही  ओन्दु
       सुख नियम  च बिधाता  कु
शांत   राख   शीतल, चित्त  चिन्ता मा
        दुःख   ओन्दु    जीवन   मा
        सुख का मतलब समझुणा।
        धैर्य राख......................।

                 कवि-विक्रम शाह(विक्की)

Ye Zindagi Ka Safar ये जिंदगी का सफर

ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर ..
डाल लागली झगुली तुम्हारी ....
तुम कने चल गये हमें यखुली छोड़ कर ..
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर .
.
बरसों बटिकी त्यारू ,नाम दिल्ल माँ छप्युं छायी ..
यु त्यारू कुबारण्या प्यार आज दिन तक्क कख लुक्युं राई ..
साफ़ नि व्हाई हमसे , पाणी माँ छापोड , छापोड कर ..
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर .
.
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर ..
डाल लागली झगुली तुम्हारी ....
तुम कने चल गये हमें यखुली छोड़ कर ..
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर .
.
तिल त ब्वाल की , घर बार तुम्हारा बाना सभी छोड़ी द्यून्लू ..
ग्वार माँ संग येकी तुम्हारा , गोर भी चरौंलू ..
नि आई तू ग्वार माँ भी .. अब्ब इंतजार माँ रुमुक पोडी गए सर ..
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर .
.
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर ..
डाल लागली झगुली तुम्हारी ....
तुम कने चल गये हमें यखुली छोड़ कर ..
ये जिंदगी का सफर मुस्किल बड़ा था मगर .
.
सर्वाधिकार सुरक्षित लाल चन्द निराला

Yanu Apnu Pahar ho यनु अप्डू पहाड़ हो

प्रस्तुत छः एक कविता
~~~~
खेतु माँ हर्याली हो ।।
बणु मा घस्यारी हो ।।

बणु् माँ फुलारी हो ।।
पन्देरो मा पन्यारी हो ।।

मनखी देवतों का भेष हो ।।
यनू अप्डू गढ़देश हो ।।

रीति हो रिवाज हो ।।
घरु घरु मा प्यार हो ।।
बार हो त्यौहार हो ।।
सौन्ज्डयों माँ उलार हो ।।

ख़ुशी सैड़ा सार हो ।।
यनु अप्डू पहाड़ हो ।।

गौं मा खूब मनखी हो ।।
ख़ुशी सभु मा बंटणी हो ।।

डाल्यों मा घुघती बसणी हो।।
अपड़ों की खुद लगणी हो।।

घर कुड़ी न क्वी सूनी हो ।।
यनि अप्डी देव भूमि हो ।।

न क्वी कुमाउनी गढ़वाली हो।
हम सब एक पहाड़ी हो ।।
सारी दुनिया मा अगाडी हो।।
मेहनत का खिलाड़ी हो ।।

भलु ब्यवहार भलु सुभौ हो।।
यन अप्डू गढ़ कुमौं हो ।।

रोजी हो रोजगार हो ।।
ब्यक्तित्व हो ब्यवहार हो ।।
सम्रद्धि हो स्व रोजगार हो ।।
क्वी भी न बेरोजगार हो ।।

बिकाश की बहार हो ।।
यनु अप्डू पहाड़ हो ।।
~~~~~~
कविता ~ सुरेन्द्र सेमवाल

Palayan Par Rota Pahari पलायन पर रोता पहाड़ी

सबसे ज्यादा पलायन पर रोता पहाड़ी है
सबसे पहले पहाड़ को छोड़ता पहाड़ी है
बैठा है शहर में ,बात करता घर गांव के समाज की
देखो!कितना विचित्र प्राणी पहाड़ी है

छोड़ आया व्यर्थ कारण पहाड़ को
पलायन पर अब पहाड़ी को कोसता पहाड़ी है


राजेन्द्र सिंह रावत©
दि०23/6/2017

Kedarnath aur uphar kand केदारनाथ और उपहार काण्ड

बिरखांत -164 : केदारनाथ और   उपहार काण्ड नहीं भूलेंगे लोग


     हर साल जून का महीना आते ही 16 तारीख को केदारनाथ की वह त्रासदी याद आ जाती है जिसमें सरकारी आकंड़ों के मुताबिक ५८०० लोग मारे गए या लापता हुए जिसमें ९२४ उत्तराखंड के बताये जाते हैं | अपुष्ट में यह आकंड़ा हजारों में है जिसमें सैकड़ों तो घोड़े- खच्चर और बिना पंजीयन के मजदूर, कुली और गाइड थे |       यह प्राकृतिक आपदा 16 और 17 जून की दरम्यानी रात्रि को अचानक बादल फटने के कारण मंदाकिनी के उग्र होने से आयी | उस क्षेत्र में यह इंतनी भयंकर आपदा थी कि जिसमें उत्तराखंड के 4219 गावों की बिजली, 1187 पेयजल योजनाएं और 2229 सड़क मार्ग अवरुद्ध हो गए | पर्वतीय क्षेत्र के उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग जिले अधिक प्रभावित हुए | आज इस घटना के तीन वर्ष बाद परिस्थिति बहुत कुछ बदल गई है परन्तु आये दिन बादल फटने की घटनायें होती रहती हैं जबकि उत्तराखंड के चार धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ,गंगोत्री और यमुनोत्री का धार्मिक पर्यटन एवं प्रकृति दर्शन सुचारू रूप से चल रहा है |      उत्तराखंड एक पर्वतीय भगौलिक संरचना का राज्य होने के कारण यहां कुदरती आपदाएं कभी भी आ सक…

मेरी आस छे तु

मेरी आस छे तु मेरी सांस छे तु
मेरी प्राणो से प्यारी मेरी जान छे तु!
मेरा दिन छे तु मेरी रात छे तु
क्वि त्वे तक पहुंच न सकु
यनि मेरी आसमान छे तु!!
बसन्त का मैनो की शरद रि्तु छे तु
जेठा का मेना कु तडतडु घाम छे तु!!
क्वि बगत भी जिकुडा से तेरी याद नि जान्दि
मेरी सुबेर छे तु अर मेरी शाम छे तु
जिकुडि कु धकध्याट आंख्यों की आस छे तु
मेरा घौर की शान अर जान छे तु!!!
गलोड्यों की लस्याण हंसी कु खिकताट
माया कु झमझ्याट आंख्यों की मुस्कान
अर सोंला गुणो कि खान छे तु!!
मेरी आस छे तु.......
मेरी सांस........
मेरी प्राणो से प्यारी मेरी जान छे तु!!!!
                        दीपु बिष्ट
                  ढमढमा चमोली गढवाल

Khuded Pran खुदेड़ प्राणा

⁠⁠⁠             खुदेड़ प्राणा

खुदेड़  प्राणा   माँ जी
खुदेंदु मुलुक बिराणा।

        सोफ़ा    मोटा      गदीयाला
        करीं   छन     झूठी      रड़ि
        कभी   नी  सियेंदु   माँ  जी
        यों    मा   घड़ी   द्वी    घड़ी।

हवालात  रात   आर    दीन
मनखी बणियों यख मशीन।

       भाई-बिरादरी न रिश्ता  नातू
       मनख्यात     नी    च    केम
       कखि    नी   दिखेंद  माँ  जी
       पाड़ी  मुल्की जनु प्यार प्रेम।

सेर    सपाट   सेणी    धर्ति
गळी   गळी  मा  गुंडा गिर्दि।

       मन्खि   बणियों   मन्खि  कु
       ळुवै    कु   प्यासू - तिसाळु
       कखि   नी   दिखेंद  माँ  जी
       सीदु-साधु  मन्खि    मयाळु।

तन     का    छीन    छाळा
मन     का     यी     काळा।

        दिन - रात     रोळा - धोळा
        मोटर - कारों   कु  घुंघयाट
        कखि नी   सुणेन्दु  माँ  जी
        गाढ़ - गदिन्यों    सुंस्याट।

वनि   सर्ग   जयूँ   रूड़ियों
पसिन्न सरु  गात सड़ियों।

          खुदेड़  प्राणा   माँ जी
          खुदेंदु मुलुक बिराणा।

                  --विक्रम शाह(विक्की)