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Rajula Malushahi राजुला मालुशाही

राजुला  मालुशाही 

         यह एक सच्ची प्रेम कथा है, बात काफी सदियों पुरानी है जब कत्यूर वंश का लगभग आखिरी दौर था, इस कथा में बहुत ही विचित्र घटनाये भी हुई। आज भी राजा मालसाई को कुमाऊ में देवता के समान पूजा जाता है। राजुला जो भोट(भूटान) की थी जिसके लिए राजा मालसाई वहा तक पहुच जाता है, और भोटियो को हरा भी देते है किन्तु आखिर में धोखे से मार दिए जाते है। राजुला एक व्यापारी की लड़की थी और मालसाई एक राजा।
तो दोस्तों आइये जाने इस पूरे घटना क्रम को कैसे यह एक अमर प्रेम कथा बनी, दोस्तों हो सकता है की इसमें को कमी भी रह गयी हो या कुछ गलतिया हुई हो उसके लिए मई आपसे माफ़ी चाहूँगा। यदि आप लोगो को इस बारे में कुछ और जानकारी हो तो कृपया अपने comments या e-mails के माध्यम से मुझे अवगत कराए हमारा e-mails पता है khudeddandikanthi@gmail.com         facebook
इसकी शुरुआत कुछ इस प्रकार हुई, जैसा की कुम्भ के मेले से आप सभी लोग अच्छी तरह वाकिफ है, और यह मेला सालो से चला आ रहा है। तो यहाँ लोग कुम्भ में नहाने लोग ददोर दूर से आते है। उस वक़्त सुनपत सौक भी यहाँ अपनी धर्मपत्नी गांउली के साथ आया हुआ था। जो भूटान का था। जिन्हें यहाँ की भाषा में भोट या भोटिया कहते है। गांउली की सुन्दरता को देखकर लोग आपना होश खो बैठते थे। उसकी सुन्दरता और रूप श्रृंगार का वर्णन लोक गथाओ में कुछ इस प्रकार है,
यानि की उसकी सुन्दरता की चाँद से तुलना की गयी है। हरिद्वार में कुम्भ का मेल चल रहा था गांउली एक स्थान पर अकेली ही बैठी थी, जो भी उसे देखता वो तरसने लगता। और यही हुआ राजा धर्म देव के साथ भी वो भी कुछ समय के लिए अचेत रह गये। और गांउली की सुन्दरता को देखकर ही उनके मन में विचार आया की इसकी अगर बेटी हुई और मेरा बेटा तो उन दोनों का विवाह कर देंगे। यही सोचते हुए राजा धर्म देव उनके पास पहुचते है, और सुनपत सौक से उनका परिचय पूछते है। की वो खा के है क्या नाम है और क्या काम करते है। तब सुनपत अपना परिचय बताता है, और राजा से भी उनका परिचय पूछता है। दोनों ही हरिद्वार नहाने गए थे क्योकि अभी तक दोनों की कोई औलाद नहीं थी। तब राजा ने सुनपत से कहा की यदि हमारे लड़का और लड़की हुए तो उनका ब्याह करा देंगे। इसपर सुन्पट कहता है की अभी तो हम में से किसी की भी औलाद नहीं है, हा यदि ऐसा हुआ तो जरूर हम ऐसा करेंगे। दोनों एक दुसरे से जुमान(वादा) करते है, और अपने अपने घर को लौटते है। तब सुन्पट को अचानक ही ख्याल आता है, कि जुमान तो कर दी है मैंने लेकि यदि मेरी लड़की हुई तो मई उसे कैसे इतनी दूर दुसरे देश में ब्याहुंगा। अब वो रात दिन ईश्वर से यही प्रार्थना करता की मेरा पुत्र हो जाये पुत्री न हो।लेकिन करनी तो उस ऊपर वाले के ही हाथ में होती है। वहा बैराठ में मालसाई का जन्म होता है।यहाँ भोट में भी एक कन्या का जन्म होता है, जिसका नाम राजुला रखा गया। अब सुनपत परेशां रहने लगा उसे हर वक़्त चिंता रहती की कैसे मै अपनी बेटी को इतनी दूर मुलुक ब्याहुंगा, अब तो हम उसे देख भी नहीं पायेंगे। ऐसे ही कुछ साल बीत गए राजुला जवान होने लगी तब सुनपत ने सोचा क्यों न मै राजुला की मंगनी(सगाई) कर दू, तो तब मुझे उन लोगो से छुटकारा मिल जायेगा।और सगाई की हुई लड़की को वो नहीं ले जायेंगे। इसी दौरान बैराठ के राजा का भी निधन हो जाता है। और राजकुमार मालसाई को राजा बना दिया जाता है। उनकी भी शादी हो जाती है। अब दूसरी ओर सुनपत राजुला के लिए वर की तलाश में निकल पड़ता है। जहा भी सुनपत जाता सभी से यही सुनने को मिलता की या तो लड़की में कोई खोट होगा या फिर घरवालो में कोई कमी होगी, नहीं तो तुम लड़का ढूंढने नहीं आते।जब कही से कोई वर नहीं मिलता तो सुनपत दुखी हो जाता है, तब आखिर में सुनपत पहुचता है नगर कोट हुणिया के घर। तब सुनपत कहता है की मै अपनी बेटी के लिए वर खोजने आया हूँ। तब हुणिया कहता है लड़के वाले लड़की खोजने जाते है न की लड़की वाले लड़का खोजने। जरूर तुम्हारी बेटी में कोई कमी होगी या तो वो अंधी बहरी होगी या फिर लूली लंगड़ी होगी। सुन्पट कहता है की नहीं जो आप सोच रहे है ऐसा कुछ नहीं है आप एक बार मेरी बेटी को देख लो, वो तो बहुत ही सुन्दर और सुशील है। तब हुणिया उसके साथ उनके गाँव चल देता है, अब दोनों सुनपत के घर पहुच जाते है। तब हुणिया की नजर राजुला पर पड़ती है, उसे देखते ही हुणिया को चक्कर आ जाता है। थोड़ी देर बाद उसे होश आता है और वो अपने ही मन में कहता है धन्य है मेरे भाग जो मुझे ऐसी बहु मिली। तब हुणिया कहता है सुनपत से बताओ कब बारात लाऊ। तब सुन्पट कहता है अभी तो मेरी बेटी छोटी है अभी तो सगाई कर देते है फिर शादी कुछ साल बाद कर देंगे। हुणिया मन जाता है। और अपने घर लौट जाता है।
 एक दिन राजुला को सपना आया कि वो मालसाई के साथ रथ में बैठी है और मालसाई कहता है राजुला से राजुला सुन ध्यान से तू मेरी बात को तेरे मेरे माँ-पिताजी ने हरिद्वार में वादा किया था की वो हमारा ब्याह कराएँगे। अब जो भी हो जैसे भी हो ये माँ-पिताजी का वचन निभाना है, अगर तो सच में सुनपत की बेटी है तो इस वचन को जरूर निभाना। तब राजुला की नींद खुल जाती है, इधर मालसाई की भी नींद खुल जाती है दोनों को एक ही सपना होता है और एक दुसरे को इस वादे के बारे में बताते है।
तब दोनों अपनी-अपनी माँ के पास जाते है। राजुला अपनी माँ से कहती है माँ रात में मैंने सपना देखा है। सच-सच बताना कुछ भी मुझसे न छिपाना क्या तुमने हरिद्वार में पछयु के साथ कोई वादा किया है? तब उसकी माँ कहती है नहीं बेटी हमने कोई वादा नहीं किया है किसने तेरे मन में ये बहम डाला ह। सपने भी कोई सच होते है। इधर मालसाई भी अपनी माँ से कहता है माँ मुझे कल सपना हुआ और मैंने सपने में राजुला को देखा है। अब तू मुझे तब बेटा कहना जब मई राजुला को ब्याह के बिरथ ले आऊंगा। सच बता मेरी माँ क्या तुम लोगो ने वादा किया था? रात सपने में वो प्रकट हो गया है।तब माँ धर्मा देव कहती है नहीं बेटा हमने कोई वादा नहीं किया था। तब मालसाई माँ की एक बात नहीं मानता और जिद्द करता है, कहता है की माँ क्या हो गया तुझे क्यों तू सच नहीं बताती है। कितना समझाने के बाद भी जब मालसाई नही मानता तब माँ को गुस्सा आता है और वो हुक्म देती है की इसे कमरे में बाद कर दो। किसी को भी मालसाई से मिलने की इजाजत नहीं थी। उसके कमरे के बहर एक कुत्ते को पहरेदारी पर बैठा दिया जाता है। अब मालसाई राजुला का ध्यान करता है, और अपने ईष्ट देवो और पितरो का सुमिरन कर कहता है, हे भगवान मुझे राजुला से मिला देनाकैसे भी।तब मालसाई को नींद पड़ जाती है। तब सपने में वो एक कबूतर बन उड़ता है राजुला की तलाश में। उड़ते उड़ते वो पहुच जाता है भूटान देश और राजुला के महल में प्रवेश करता है। राजुला उसे देखती है और कहती आहा कितना सुन्दर है कहा से आया होगा ये कबूतर रंग बिरंगा कितने सुन्दर पंखो वाला है ये इतना सुंदर है तो वो देश कितना सुंदर होगा जहा से ये आया है। तब उसके लिए चांदी की कटोरी में खाना लती है उसे खिलाती है।तब वो राजुला के और नजदीक आता है, उसे देख राजुला कहती है कैसे मै तेरी भाषा को समझू। तब राजुला श्री बागनाथ भगवान का ध्यान करती है और कहती है हे बागनाथ आज मेरा साथ देना मेरी मदद करना, मुझे इस पंचरंगी पक्षी की भाषा को समझने की शक्ति देना। पुकार बागनाथ भगवान सुनते है और उसी वक्त राजुला को भी कबूतर बना देते है। अब बन जाता है दो हंसो का जोड़ा और दोनों आकाश में उड़ने लगते है। उड़ते उड़ते दोनों मानसरोवर पहुचते है वहा से जुहार-मुनस्यार, मुनस्यार से उड़ान भरी पहुचे भटकोट के जंगल अब यहा से शुरू हो जाता है मालसाई का मुलुक। फिर पहुचते है गांधी गिवाड़ तब बैराठ पहुच कर मालसाई राजुला को बताता है की ये है मेरा बैराठ यह है रामगंगा ये मेरा महल है। अब वो उड़ते उड़ते भोट की तरफ वाविस लौटते है तब मालसाई कहता है सुन मेरी राजुला अब तू मुझे कब मिलेगी? कैसे होगी शादी हमारी? दे जा तू मुझको वचन की फिर तू मुझे मिलेगी। जब बागेश्वर का मेला होता है तो सारे भोटिया मेला देखने यहा आते है, तू भी जरूर आना मुझे जरूर मिलना। तू वहां मुझे मिलना वही से तुझे मै घर ले आऊंगा, लेकिन तू अकेली ही आना। उड़ते-उड़ते दोनों बागनाथ पहुच जाते है। तब राजुला कहती है, की स्वामी अब हम कैसे मिल सकते है मेरे पिताजी तो मुझे अकेले कैसे आने देंगे बागनाथ मेले में मै एक औरत जात हूँ। तुम ही मुझे कोई बहाना बता दो। तब मालसाई कहता है राजुला से हे प्रियेसीक्या तुझे औरतो के लक्षण नही मालूम तो ठीक है मै तुझे बताता हु औरतोंके बीमारी के लक्षण पेट में दर्द, सर में दर्द, दिल की बीमारी, इस तरह के कितने ही बहाने है। तब राजुला समझ जाती है और मालसाई को वचन देती है की स्वामी मै बागनाथ मेले में जरूर आउंगी। तब दोनों अपने अपने घर को चले जाते है। मालसाई की नींद खुलती है, और मालसाईअपनी माँ से पूछता है की माँ बागनाथ का मेला कब होता है? राजुला मुझे वहा मिलने आएगी माँ बता दे कब होता है बागनाथ का मेला। माँ मुझे बीटा तब कहना जब मै राजुला को बैराठमें ले आऊंगा। और जो भी होगा फिर देखा जायेगा लेकिन मै राजुला से ब्याह जरूर करूँगा। अब माँ मालसाई को समझती है बेटा न कर ऐसी हट मत कर तू राजुला का ध्यान भूल जा उसको, मन जा बेटे तू मेरी बात को।   लेकि मालसाई माँ की एक बात नहीं मानता और अपनी जिद पर बना रहता है। तब माँ को गुस्सा आ जाता है और वो राजदरबार में हुक्म दे देती है की मालसाई को बंद कर दिया जाय और उससे मिलने की इजाजत किसी को भी नहीं थी। उसके दरवाजे के बहार एक बहुत ही खतरनाक कुत्ते को तैनात कर दिया जाता है और एक कौवे को भी उसका चौकीदार रख दिया गया। राजुला के बिना मालसाई उदास हो जाता है, रोते-रोते मालसाई को नींद पड़जाती है। भोट में राजुला सुनपतसे कहती है कि पिताजी मुझे कल रात सपना हुआ क्या आपने कभी किसी से कोई वादा किया था हरिद्वार में सपने में मुझे पाली पछोउ के राजा मिले। तब सुनपत कहता है बेटी पछौ का नाम भी मत ले हम कभी हरिद्वार भी नहीं गये ना ही मुझे कुछ याद है। बेटी पछौ मुलुक बड़ा ही विचित्र है उनके रीती-रिवाज़ भी उलटे है। क्या विचित्र देखा आपने पिताजी मुलुक पछौक? पिताजी बेमतलब उनका
बदनाम नही करना मुझे बताओ क्या है उनकी उल्टी रीत।
बेटी एक जोड़ी बैल वह सात घर के है, एक ही तवै में पूरा गाँव रोटी बनाते है।
धन है पिताजी वो मुलुक धन है वह के लोग जिनमे इतना मेल-जोल है प्यार-प्रेम है सुनपत राजुला की एक नहीं सुनता और कहता है सुन बेटी मै तुझे बताता हु अपनी विपति तुझे बताता हु, एक बार बेटी मै वहां अपने बकरी चराने ले गया था तो वह के लोगो ने बकरियों के सर और कान काट दिए। वो लोग भले लोग है बेटी तूने कैसे ये कह दिया।
पिताजी तुमने क्या किया था उनके साथ बिना बात के तो कोई किसी को दुःख नही देता।
बेटी एक माण(मन) नमक के बदले मैंने उनसे एक माण घी लिया था। तब बेटी उन्होंने बकरियों के कान काट दिए।  
तब भी पिताजी वो भले लोग है। न करो पिताजी बुराई वह के लोगो की। 
बेटी वह से मै चौकोट इलाके में गया एक मण नमक के बदले मैंने दो मण धान लिए। तब उन्होंने बकरियों की टंगे तोड़ दी। 
तब भी पिताजी वहा के लोग भले ही है जो उन्होंने आपको अपने देश में आने भी दिया।
तब चौकोट से बेटी मई द्वारहाट गया उन्होंने तो सब बकरियों के सर काट दिए। 
किस्मत अच्छी थी पिताजी जो उन्होंने दया कर दी। सीधे-साधे लोग वहा के जो जिन्दा बचकर आ गए आप। यदि इस भोट मुलुक में होते तो सब मार देते। विचित्र तो ये भोट मुलुक है जहा से कोई भी बचकर घर नही जाता।
अब राजुला माँ के पास जाती है और माँ से पूछती है माँ बागनाथ मेला कब है, माँ जवाब देती है बेटी अभी बागनाथ मेले के बहुत दिन है। अब बागनाथ मेले के कुछ ही दिन रह गये तो राजुला को चिंता होने लगी क्या बहाना करू। तब राजुला ने पेट दर्द का बहाना किया उसके माँ-पिताज़ी तक खबर पहुच गयी। तब माँ पूछती है बेटी कैसा दर्द हो रहा है। हाथ जोड़कर राजुला कहती है माँ अब मै नहीं बचूंगी तुम ठीक से रहना मैबागनाथ का मेला भी नहीं देख सकी। माँ का दिल भर आता है कहती है बेटी ऐसी बात न कर। सुनपत राजुला की चाल को समझ जाता है। गुस्से से भर जाता है और राजुला को पिलाने के लिए ज़हर मंगवाता है, ज़हर राजुला को पिला देता है। अब राजुला कहती है माँ मेरे जाने का दुःख नहीं मानाना अब मै जाती हु माँ। तब उसकी बात सुनकर दिल भर आता है और उसका ज़हर उतार देते है। अब राजुला कहती है पिताजी मेरे कान में एक आवाज आई थी श्री बागनाथ ने मेरे कानो में कहा कि राजुला ये सब मै ही कर रहा हु, तेरे पिताजी ने जुबान की थी की बागनाथ तेरी पूजा दूंगा जो मेरी संतान हो जाएगी तो और वो पूजा देने नहीं आया जिसका ये फल है।  बताओ पिताजी क्या कभी आपने ये प्रण किया था। तब सुनपत बेटी के कारण हा कहता है।
अब राजुला मन ही मन खुश होती है और माँ से कहती है की माँ यदि वहा मुझपर कोई विपदा आएगी तो कौन मेरी रक्षा करेगा। ऐसा करते है माँ की तू मेरे नाम का दान कर दे, तब माँ एक-एक करके सब दान करती है, जितने भी दान होते है सब करने के पश्चात् राजुला कहती है माँ तू मुझे भेड़ की पशमीना दे दे रेशमी कपड़े सोने की बिंदिया, हाथो की पौजिया, कानो के झुमके, गले कर, नाक की नथ, सोने की चूड़ी, अंगूठी, गले की जंजीर,पाँव की पायल, माँगटीका  इत्यादि सब कुछ मांग लेती है। अब राजुला सज-धज कर गुड़, थोड़ा तेल, सोने का छतर,चांदी की धुपिण, चांदी का पतर तथा पूजा का सामान लेकर राजुला बागनाथ के रस्ते पर चल पड़ती है। अब राजुला चलते-चलते रोने लगती है आगे को बढ़ते पाँव पीछे को हटते है। राजुला अब घर से बहुत दूर निकल जाती है, दूसरी ओर बागनाथ राजुला से रुष्ट हो जाते है मालसाई बैराठ में सोया ही रह जाता है, राजुला बागनाथ का रास्ता भूल जाती है। बागनाथ नाराज हो जाते है और तभी उन दोनों को मिलने नहीं देते। अब जब राजुला नंगे पाँव दौड़ते-दौड़ते बहुत दूर पहुँच जाती है तो वह उसे उसके मामा की लडकिया जिनका नाम हिल मोती बिल मोती है मिलती है। जो राजुला से नाचने के लिए आग्रह करती है तब राजुला उनसे दूर नाचने लगती है।
अब राजुला रामोलिका कोट पहुँचती है वहां उसे सदुबा रमोला मिलता है जो अपने गाय बकरी चराने आया हुआ था, उसकी राजुला पर नज़र पड़ती है तो हो अपने होश खो बैठता है। अब सदुबा एक पाँव पर नाच करते हुए आँख बंद कर बांसुरी बजाने लगता है(इस क्षेत्र में आज भी एक पाँव पर नाच बहुत होता है ये काफी पुराने समय से चला आ रहा है)। अपने ही मन में कहता है बारह बीसी बकरी और नौ बीसी भेड़ (एक बीसी= बीस)  इसे पाने के लिए मई सब कुछ बेच दू तब भी मई इसे पाकर रहूँगा। अब वो राजुला से कहता है हे सुन्दरी तू कहा से आई है चल मेरे साथ मेरी रानी बनकर रहना सब काम मै खुद करूँगा तू बस आराम करना और खाना पकाना। अब राजुला कहती है कि तेरा ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि मुझे कल सुबह तक बागेश्वर जरूर पहुंचना है। सदुबा उसकी बात नहीं मानता और उसपर जादू करता है अब राजुला अपनी जगह से हिल भी नहीं सकती थी ये उस जादू का ही असर था। अब सदुबा बहुत खुश हो जाता है, लेकिन राजुला भी उसपर हसती है और वो भी उसपर जादू करती है। अब सदुबा के प्राण निकलने को हो जाते है उसके हाथ से उसकी बांसुरी और डंडा सब छूट जाते है तब वो राजुला से माफ़ी मांगता है और कहता है की मुझे बचाले मैअपने जादू को अभी उतर देता हूँ। और वो वही अचेत हो जाता है राजुला को उसपर दया आ जाती है और वो उसे सचेत कर देती है, और वह से आगे निकलती है। रात का वक़्त हो जाता है राजुला जंगल में भटकती हुई रोती हुई वो अपने मन में सोचने लगती है कि आज अब मै नहीं बचूंगी, यहाँ मुझे शेर, बाघ जैसे जंगली जानवर खा जायेंगे। अब उसे माँ के वचन भी याद आने लगता है की बेटी न जा तू अकेले इतनी दूर। लेकिन दूसरी तरफ मन में मालसाई का खयाल भी मन में था, ये सोचते सोचते और आगे बढ़ते-बढ़ते सुबह हो गयी और राजुला बागनाथ मंदिर में पहुँच जाती है। बागेश्वर में मेला हो रहा था दुनिया भर से लोग वह पहुचे थे लेकिन मालसाई कही भी नज़र नही आ रहा था। 
कैडरों बौडारो  से बाइस भाई आये हुए थे जो लोगो का गीत गाकर मनोरंजन कर रहे थे जब उन्होंने झोड़ा गाना शुरू किया तो सभी लोग वह जमा हो गए और राजुला भी वही खड़ी उन्हें देख रही थी। झोड़ा कुछ ऐसा था-
झोड़ा जैसा की आप लोगो ने देखा होगा की एक दूसरे के कंधे पर या कमर में हाथ डालकर गाते हुए कमर को झुकाकर नाच होता है, अब जब वो लोग सीधे ऊपर को होते है तो उनकी नज़र राजुला पर पड़ती है और सभी भाई एक-एककर चक्कर खाके नीचे गिरने लगते है। अब राजुला ने मेले का पूरा आनंद लिया लेकिन मालसाई अब भी कही नज़र नही आया तब वो निराश होकर बागनाथ भगवान के थान(मंदिर) में पहुँचती है। मंदिर में जाकर वो रोने लगती है ईश्वर से प्रार्थना करती है की मुझे मालसाई से मिला दो हे भगवान। रोते रोते राजुला की आँखे लाल हो गयी। वही वो अपना सिर पटकने लगती है। कहती है हे बागनाथ भगवान मै जितना भी सामान लाई सब तुम्हे चढा दिया तुम्हे मैंने भेट भी  चढ़ा दी है लेकिन फिर भी मेरे स्वामी मेले में क्यों नही आये है।अब श्री बागनाथ भगवान को राजुला पर दया आती है और राजुला की हालत देख कर बागनाथ भगवान का मन भर भर आता है। अब श्री बागनाथ भगवान की आँखों से भी आंसू आ जाते है, तब राजुला मन में ही सोचती है कि तुम किस बात के भगवान हो हे सर्वशक्तिमान तुम ही रोने लगे हो किस बात की शक्ति तुममे किस बात के हो तुम भगवान। यदि तुम्हारे में शक्ति होती तो तुम आज यही हमें मिला देते। अब राजुला को भगवान का रोना देखकर गुस्सा आता है और वो आग लगाकर श्री बागनाथ की एक आँख फोड़ देती है। अब बागनाथ भगवान नाराज हो जाते है और उसी वक़्त राजुला को श्राप देते है जा तेरी मालसाई से भेट न हो और तू बीती का रास्ता भी भूल जाये। जो तेरे पास बिष है वो भी तेरे काम ना आ सकेगा। जब तुझे याद भी आ जाय तो सब उल्टा हो जायेगा। लेकिन राजुला अब भी हिम्मत नहीं हारती और अब वो गिवाड़ा जाने का मन बना लेती है। हे मेरे ईष्ट देवो यदि तुम कही हो तो मुझे वहां पहुंचा देना। अब राजुला मंदिर से बहार आती है और अपने रास्ते निकल पड़ती है। बागेश्वर से गरूड़ से कौसानी से सौमेश्वर होते हुए वो बिंदिया स्यार में पहुँचती है। कहैड़ कोट का अधिपति कउवा जिसके छह बेटे नौ पोते थे नागुली भागुली दो भैंस थी और बहुत बड़ा कारोबार भी था उसका।
क्रमश:
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